धनतेरस पर यहां विराजते हैं भगवान कुबेर! 1200 साल पुराने मंदिर का रहस्य जानकर रह जाएंगे हैरान, शिव पंचायत में होते हैं धन के देवता के दर्शन

मंदसौर धौलागढ़ महादेव मंदिर

मंदसौर। धनतेरस का पर्व आते ही देशभर में भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी के पूजन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक ऐसा प्राचीन शिव मंदिर भी है, जहां धन के देवता भगवान कुबेर भगवान शिव की पंचायत में विराजमान हैं। मंदसौर धौलागढ़ महादेव मंदिर अपनी इसी दुर्लभ धार्मिक और ऐतिहासिक विशेषता के कारण धनतेरस पर श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन जाता है। करीब 1200 वर्ष पुराने इस मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय के साथ भगवान कुबेर के दर्शन होते हैं।

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मंदसौर के खिलचीपुरा क्षेत्र में स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर विश्वप्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मंदसौर को लंकापति रावण की ससुराल और माता मंदोदरी का मायका भी माना जाता है। ऐसे धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले नगर में स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यता और प्राचीन कुबेर प्रतिमा के कारण विशेष पहचान रखता है।

मंदसौर धौलागढ़ महादेव मंदिर

धनतेरस पर क्यों खास है मंदसौर का धौलागढ़ महादेव मंदिर?

 

धनतेरस को धन, आरोग्य और समृद्धि की कामना का विशेष पर्व माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कुबेर धन-संपत्ति और वैभव के अधिपति हैं। यही वजह है कि धनतेरस के अवसर पर मंदसौर धौलागढ़ महादेव मंदिर में भगवान शिव के साथ भगवान कुबेर की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व रहता है।

 

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान कुबेर अकेले किसी अलग स्थान पर नहीं, बल्कि शिव पंचायत के साथ गर्भगृह में विराजमान हैं। श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव और कुबेर का पूजन करते हुए सुख-समृद्धि, व्यापार में उन्नति और आर्थिक संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।

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मान्यता है कि उत्तराखंड के केदारनाथ धाम के बाद मंदसौर का यह मंदिर उन दुर्लभ धार्मिक स्थलों में शामिल है, जहां भगवान कुबेर को शिव परिवार के साथ गर्भगृह में स्थान प्राप्त है।

 

धनतेरस 2026 पर सुबह 4 बजे होगा भगवान शिव और कुबेर का महाभिषेक

 

धनतेरस के पावन अवसर पर श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों की तैयारी की गई है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मंदिर में ब्रह्म मुहूर्त से लेकर देर रात तक पूजन, अभिषेक और हवन का आयोजन होगा।

 

धार्मिक कार्यक्रमों की रूपरेखा इस प्रकार है—

 

  • प्रातः 4 बजे: ब्रह्म मुहूर्त में भगवान शिव और भगवान कुबेर का विशेष द्रव्यों से महाभिषेक किया जाएगा।

  • महाशृंगार: अभिषेक के बाद भगवान का आकर्षक और मनोहारी शृंगार होगा।

  • दिनभर पूजन एवं हवन: वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजन और हवन का आयोजन किया जाएगा।

  • देर रात महाआरती: धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्णाहुति के साथ महाआरती संपन्न होगी।

 

धनतेरस के अवसर पर यहां देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने की मान्यता और परंपरा रही है।

 

7वीं शताब्दी की है भगवान कुबेर की दुर्लभ प्रतिमा, जानिए क्या है खासियत

 

मंदसौर धौलागढ़ महादेव मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि पुरातात्विक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञ डॉ. कैलाश शर्मा के अनुसार मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना है, जबकि गर्भगृह में स्थापित भगवान कुबेर की पाषाण प्रतिमा सातवीं शताब्दी यानी उत्तर गुप्तकाल की मानी जाती है।

 

करीब तीन फीट ऊंची इस प्राचीन प्रतिमा में भगवान कुबेर को उनके पारंपरिक स्वरूप में दर्शाया गया है। प्रतिमा की प्रमुख विशेषताएं हैं—

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  • भगवान कुबेर का बड़ा उदर और चार भुजाएं।
  • वाहन के रूप में नेवले (नकुल) का अंकन।

  • एक हाथ में धन की थैली।

  • दूसरे हाथ में अमृत अथवा सुरा का पात्र।

 

पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान वर्ष 1978 में इस प्रतिमा की पहचान आधिकारिक रूप से भगवान कुबेर के रूप में दर्ज की गई थी।

 

बताया जाता है कि मराठा शासनकाल के दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था। इसी दौरान प्राचीन कुबेर प्रतिमा को विशेष आदर के साथ गर्भगृह में स्थापित किया गया।

 

क्या सच में उड़कर आया था धौलागढ़ महादेव मंदिर? जानिए लोकमान्यता

 

इस प्राचीन मंदिर को लेकर स्थानीय क्षेत्र में कई रोचक लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे चर्चित मान्यता यह है कि मंदिर किसी दूसरे स्थान से उड़कर यहां आया था। स्थानीय लोगों के बीच यह भी चर्चा रहती है कि मंदिर की पारंपरिक गहरी नींव नहीं है।

 

हालांकि इस मान्यता की वैज्ञानिक या पुरातात्विक स्तर पर पुष्टि नहीं हुई है। पुरातत्वविद मंदिर की संरचना को स्थापत्य कला की विशिष्ट तकनीक से जोड़कर देखते हैं। मंदिर की प्राचीन वास्तुकला और निर्माण शैली आज भी लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।

 

मंदिर की ऐतिहासिक संरचना को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इसके मूल स्वरूप को यथासंभव संरक्षित रखा गया है।

 

रावण की ससुराल मंदसौर में क्यों खास है यह शिव मंदिर?

 

मध्य प्रदेश का मंदसौर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अपनी अलग पहचान रखता है। पौराणिक मान्यताओं में इसे रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका बताया जाता है। यहां स्थित श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर भी देशभर में प्रसिद्ध है।

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इसी धार्मिक नगरी के खिलचीपुरा क्षेत्र में स्थित धौलागढ़ महादेव मंदिर अपनी प्राचीन कुबेर प्रतिमा और शिव पंचायत में भगवान कुबेर की उपस्थिति के कारण अलग महत्व रखता है।

 

धनतेरस पर जब लोग धन और समृद्धि की कामना के साथ भगवान कुबेर का पूजन करते हैं, तब यह प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है। भगवान शिव के सानिध्य में धनपति कुबेर के दर्शन इस मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता हैं।

 

यही वजह है कि मंदसौर का धौलागढ़ महादेव मंदिर सिर्फ एक प्राचीन देवस्थान नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व और धार्मिक आस्था का ऐसा संगम है, जिसकी विशेषता इसे देश के अन्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है।