भारत का स्वदेशी ‘S-400’: जुलाई में होगा ‘प्रोजेक्ट कुशा’ का पहला मिसाइल टेस्ट; सीमा पार 400 KM दूर ही दुश्मन को भस्म करेगी यह ‘सुपर शील्ड’

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भारत का स्वदेशी ‘S-400’: जुलाई में होगा ‘प्रोजेक्ट कुशा’ का पहला मिसाइल टेस्ट; सीमा पार 400 KM दूर ही दुश्मन को भस्म करेगी यह ‘सुपर शील्ड’। भारत अपने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ की एक ऐसी ऐतिहासिक कामयाबी हासिल करने के बेहद करीब पहुंच गया है, जो देश के आसमान को पूरी तरह ‘अभेद्य’ (इम्प्रेग्नेबल) बना देगी। भारत में ही पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित किए जा रहे एडवांस लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम यानी ‘प्रोजेक्ट कुशा’ (Project Kusha) का पहला मिसाइल टेस्ट जुलाई के आखिरी हफ्ते में होने जा रहा है।

भारत का स्वदेशी ‘S-400’: जुलाई में होगा ‘प्रोजेक्ट कुशा’ का पहला मिसाइल टेस्ट; सीमा पार 400 KM दूर ही दुश्मन को भस्म करेगी यह ‘सुपर शील्ड’

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा तैयार किए जा रहे इस सिस्टम को ERADS (एक्सटेंडेड रेंज एयर डिफेंस सिस्टम) कहा जाता है। इसे भारत का अपना ‘S-400’ माना जा रहा है, जो दुश्मन के लड़ाकू विमानों, ड्रोन और मिसाइलों को भारतीय सीमा में घुसने से पहले ही हवा में राख करने की ताकत रखता है।

तीन परतों वाला अभेद्य कवच: M1, M2 और M3 मिसाइलें

प्रोजेक्ट कुशा के तहत भारत एक ऐसा त्रिशूल (थ्री-लेयर डिफेंस) तैयार कर रहा है, जो अलग-अलग दूरी पर दुश्मनों का काल बनेगा:

  1. M1 मिसाइल (दूरी: 150 किमी): जुलाई के अंत में होने जा रहे परीक्षण में इसी बेस मिसाइल की मारक क्षमता को परखा जाएगा।

  2. M2 मिसाइल (दूरी: 250 किमी): यह मिसाइल एक बड़े बूस्टर के साथ आएगी, जो मध्यम दूरी के हवाई खतरों को बीच रास्ते में ही इंटरसेप्ट (रोकने) करने के लिए डिज़ाइन की गई है।

  3. M3 मिसाइल (दूरी: 350 से 400 किमी): यह इस सिस्टम का सबसे बाहरी और अचूक कवच होगा। यह दुश्मन के विमानों या मिसाइलों को भारत की सीमा से 400 किलोमीटर दूर (पड़ोसी देशों की सीमा के भीतर ही) ढेर कर देगा।

ध्वनि से 5.5 गुना तेज रफ्तार और 80% से ज्यादा सटीक निशाना

  • तूफानी सुपरसोनिक स्पीड: इस सिस्टम की मिसाइलें मैक 5.5 ($Mach\ 5.5$) की अविश्वसनीय रफ्तार से उड़ेंगी। यानी यह ध्वनि की गति से साढ़े पांच गुना तेजी से दुश्मन पर झपटेंगी, जिससे बचने का मौका किसी भी आधुनिक विमान को नहीं मिलेगा।

  • अचूक मारक क्षमता: रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका ‘सिंगल-शॉट किल प्रोबेबिलिटी’ 80% से ज्यादा है। इसका मतलब है कि अगर इस सिस्टम से एक मिसाइल भी दागी गई, तो टारगेट के बचने की उम्मीद 20% से भी कम होगी।

  • किन खतरों का करेगा खात्मा?: यह आसमान में छिपे दुश्मन के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों, भारी जासूसी ड्रोन, सबसोनिक क्रूज मिसाइलों और आसमान से नजर रखने वाले भारी-भरकम AWACS (अवाक्स) विमानों को पलक झपकते ही मटियामेट कर देगा।

‘आकाशतीर’ से लैस डिजिटल नेटवर्क: कंप्यूटर खुद लेगा फैसला

प्रोजेक्ट कुशा की सबसे बड़ी ताकत इसका अत्यधिक आधुनिक, डिजिटल और नेटवर्क-सेंट्रिक होना है। यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के IACCS और थल सेना के ‘आकाशतीर’ (Akashteer) ऑटोमेटेड एयर डिफेंस कंट्रोल नेटवर्क से सीधे इंटीग्रेट (जुड़) जाएगा।

मल्टी-फंक्शन कंट्रोल रडार (MFCR) की मदद से जल, थल और नभ तीनों सेनाएं रीयल-टाइम में डेटा शेयर कर सकेंगी। खतरा देखते ही इसका एडवांस कंप्यूटर सिस्टम खुद तय कर लेगा कि किस मिसाइल को किस टारगेट के लिए पहले फायर करना है।

21,700 करोड़ का भारी-भरकम बजट और ‘आत्मनिर्भर’ निर्माण

भारतीय वायुसेना (IAF) ने इस घातक सिस्टम की 5 स्क्वाड्रन खरीदने को हरी झंडी दे दी है और सरकार ने इसके लिए 21,700 करोड़ रुपये के बजट (AoN) को मंजूरी दी है। वायुसेना के बाद इसे भारतीय नौसेना के युद्धपोतों के लिए भी कस्टमाइज़ किया जाएगा। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इसके निर्माण की मुख्य जिम्मेदारी सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज रक्षा कंपनियों भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और भारत डायनामिक्स लिमिटेड (BDL) को सौंपी गई है।

2028 तक सेना का हिस्सा बनेगा सिस्टम

जुलाई में होने वाला यह आगामी टेस्ट मिसाइल के प्रोपल्शन (इंजन) और सीकर (सटीक टारगेट ढूंढने वाली आंख) की क्षमता को जांचने के लिए टर्निंग पॉइंट साबित होगा। रक्षा गलियारों में माना जा रहा है कि अगर जुलाई का टेस्ट सफल रहता है, तो वर्ष 2028 से 2030 के बीच यह ‘सुपर शील्ड’ पूरी तरह से भारतीय सशस्त्र बलों का मुख्य सुरक्षा कवच बन जाएगी।