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सादगी की मिसाल: आदिवासी शादियों में न टेंट का तामझाम, न फिजूलखर्ची; गर्म खेतों में जमीन पर बैठकर हो रही दावत

सादगी की मिसाल: आदिवासी शादियों में न टेंट का तामझाम, न फिजूलखर्ची; गर्म खेतों में जमीन पर बैठकर हो रही दावत,आज के दौर में जहाँ शादियां अपनी शानो-शौकत और लाखों-करोड़ों के खर्च के लिए जानी जाती हैं, वहीं हमारे बीच एक ऐसा समाज भी है जो आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। क्षेत्र का आदिवासी समाज दिखावे की इस दौड़ से कोसों दूर, अपनी सदियों पुरानी सादगीपूर्ण परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।

खेत और खलिहान ही बने ‘मैरिज गार्डन’

मई की इस भीषण गर्मी में जहाँ लोग एयर कंडीशनर (AC) हॉल ढूंढते हैं, वहीं आदिवासी समाज में शादियों के आयोजन खुले खेतों और खलिहानों में हो रहे हैं। यहाँ न तो महंगे टेंट का तामझाम है और न ही कैटरिंग का झंझट। पूरा गांव एक परिवार की तरह इस उत्सव का हिस्सा बन रहा है।

जमीन ही बिछौना, सादगी ही गहना

इस समाज की शादियों की सबसे खास बात इनकी दावत है। यहाँ वीआईपी (VIP) कल्चर के बजाय समानता की तस्वीर दिखती है। मेहमान और रिश्तेदार तपती गर्मी में भी खेतों की गर्म जमीन पर बिना किसी बिछौने के बैठकर भोजन करते हैं। जमीन ही इनका आसन है और परंपरा ही इनका सबसे बड़ा गहना।

समाज के लिए एक बड़ी मिसाल

खर्चीली शादियों के कारण कई परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं, ऐसे में आदिवासी समाज की ये शादियां अन्य समाजों के लिए एक बड़ी मिसाल हैं। दिखावे से दूर, ये आयोजन आपसी प्रेम और सामुदायिक एकता का प्रतीक हैं। मई के पूरे महीने क्षेत्र में इन शादियों की धूम इसी तरह जारी रहेगी।

Usha Pamnani

20 वर्षों से डिजिटल एवं प्रिंट मीडिया की पत्रकारिता में देश-विदेश, फ़िल्म, खेल सहित सामाजिक खबरों की एक्सपर्ट, वर्तमान में यशभारत डॉट कॉम में वरिष्ठ जिला प्रतिनिधि