Election voting fact 2003 से हर साल बढ़ा लगभग 3 फीसदी मतदान पर सरकार नहीं बदली, तो आखिर गणित क्या, पढ़िए

आशुतोष शुक्ला। Election voting fact 2003 से हर साल लगभग 3 फीसदी मतदान बढ़ा पर सरकार नहीं बदली 2018 को छोड़ दें तो भाजपा को ही अच्छा बहुमत मिला। तो गणित क्या? हम समझाते हैं। 1998 में छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद एमपी के इलेक्शन में सब कुछ चेंज हो गया। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की ताकत पहले ही थी लेकिन यह जैसे ही मध्यप्रदेश से अलग हुई सीधे सीधे बीजेपी को फायदा मिलने लगा। 2003 उमा भारती ने 170 से अधिक सीटों के साथ कांग्रेस को उखाड़ फेंका उसके बाद 2008, 2013 के चुनावों में भी भाजपा ने बम्पर फायदा उठाया।

इन मतदाओं से बढ़ा वोटिंग प्रतिशत
अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों तो हम आपको बता दें कि नए मतदाताओं के कारण ऐसा होता है। 2003 में करीब 67 फीसदी मतदान के बाद यह 2 फीसदी बढ़े। उसके बाद यह 3 फीसदी बढ़कर 2018 में 69 फीसदी आंकड़ा जा पहुंचा फिर 2013 में भी यह करीब 3 फीसदी ही बढ़ा तथा 72 फीसद जा पहुंचा। कह सकते हैं अब न तो यह कोई जागरूकता के कारण हुआ न ही सरकार के खिलाफ एन्टीईकम्बेंसी के प्रमाण मिले औऱ तो और 2018 में भी यह 3 फीसदी बढ़ा तब जब कांग्रेस के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया साथ मे थे तो वहीं आरक्षण अर्थात “माई के लाल” का मुद्दा जमकर फैला था पर असर इतना ही हुआ कि भाजपा 109 पर सिमटी बाद में उसने सरकार भी बना ली।
महिलाओं ने 2003 में भी बम्पर वोटिंग की थी
सवाल जो राजनीतिक पंडित वोटिंग प्रतिशत बढ़ने का निकाल रहे वह प्रदेश में नए बढ़े मतदाताओं की संख्या पर ध्यान नही दे रहे। खास बात एक और यह है कि महिलाओं ने 2003 में भी बम्पर वोटिंग की थी किंतु बाद में निष्कर्ष सामने आया तो पता लगा कि यह दिग्विजयसिंह सरकार को उखाड़ने के लिए नहीं बल्कि प्रदेश में एक महिला मुख्यमंत्री को काबिज कराने के लिए था। साफ है महिला वोट देने निकलती है तो किसी को हटाने से ज्यादा वह किसी को लाने या फिर कुछ बचाने निकलती है।
शिवराज को बाहर रखना स्ट्रैटजी
इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ जैसे ही शिवराज सिंह गायब हुए यह हवा फैली की भाजपा चौहान को सीएम नहीं बनाएगी लिहाजा बहनों ने मुंह बोले भाई के लिए जमकर वोटिंग की, यही चर्चा थी। तो फिर किस गणित से कांग्रेस समर्थक लोग इसे कांग्रेस के पक्ष में देख रहे? समझने की कोशिश करना पड़ेगी।
अब बीते आंकड़ों को गौर से देखें तो हर बार 2 से 3 फीसदी नए वोटर जुड़ते है। यही लोग प्रतिशत को बढ़ाते हैं। युवा फर्स्ट टाइम मतदाता भाजपा के प्रति इस कदर झुकाव रखते हैं कि उनके ही कारण सिर्फ विधानसभा ही नहीं लोकसभा में भी मतदान प्रतिशत बढ़ जाता पर फायदा बीजेपी को होता है यह किसी से छिपा नहीं।
घर की महिलाओं से बात करें साफ हो जाएगी एग्जिट पोल की तश्वीर
अब बात महिलाओं की करें तो सीधा सा गणित यह है कि लोग इधर उधर की जगह अपने घर की महिलाओं से बात करें साफ हो जाएगा कि लाडली बहना का क्या रोल रहा असली भितरघात तो घर पर ही हो गया जब पति की इच्छा के विरुद्ध भी पत्नि ने अपने मुंहबोले भाई मतलब शिवराज सिंह को शायद चुना जैसी चर्चा है। मतलब भाजपा की यह स्ट्रेटजी भी कामयाब होती नजर आई।
लाभार्थी केटेगरी ही बना दी बीजेपी ने
अब तथ्य एक ओर सामने यह है कि भाजपा ने बाकायदा लाभार्थी श्रेणी ही बना दी थी जिसके 80 फीसदी डेटा भाजपा के पास था जिसमे लाडली लक्ष्मी, लाडली बहना, उज्ज्वला गैस, महिलाओं को आरक्षण, आयुष्मान कार्ड, सम्बल योजना और सबसे बड़ी मुफ्त राशन के लाभारथी हर विधानसभा में मोटे तौर पर 80 हजार के आसपास थे ऐसे में लाभ लेने वाले 40 हजार भी एक जुट हो जाएं तो सरकार का सत्ता में कबिज होना तय है।
अब आप समझ गए होंगे कि अधिकांश मत प्रतिशत बढ़ने का कारण क्या था। आंकड़े बहुत हैं जिन्हें हम बारी बारी से प्रदेश और कटनी स्तर पर बताते रहेंगे तो बने रहिए yashbharat.com के साथ। कल हम बताएंगे 2018 के चुनाव में कौन कहां से कितनी लीड लेकर विधानसभा जाने की उम्मीद में था फिर क्या हुआ। जो भी परिणाम आएं पर कटनी जिले में वोटिंग बढ़ने के चलते इस बार हमारा अनुमान चारों सीटों पर भाजपा को फायदा दिख रहा जो शायद राजनीतिक पंडितों के गले भी न उतरे पर कहावत सही है…..पढ़े लिखे को फारसी क्या।








