Borders Beyond Humanity: जब शासन संवेदनशील हो, तो सीमाएं भी रिश्तों को नहीं रोक सकतीं!” पढ़िए कटनी कलेक्टर की वो पहल जिसने नेपाल के एक परिवार की उजड़ी खुशियां लौटा दीं

जब शासन संवेदनशील हो, तो सीमाएं भी रिश्तों को नहीं रोक सकतीं!" पढ़िए कटनी कलेक्टर की वो पहल जिसने नेपाल के एक परिवार की उजड़ी खुशियां लौटा दीं

जब शासन संवेदनशील हो, तो सीमाएं भी रिश्तों को नहीं रोक सकतीं!” पढ़िए कटनी कलेक्टर की वो पहल जिसने नेपाल के एक परिवार की उजड़ी खुशियां लौटा दीं

कटनी/नई दिल्ली: कभी-कभी एक छोटी सी मानवीय चूक किसी मासूम को अपनों से मीलों दूर कर देती है, लेकिन जब संवेदनशील प्रशासन, समर्पित अधिकारी और विधिक प्रयास एक साथ खड़े हो जाएं, तो सीमाओं के बंधन भी आड़े नहीं आते। ऐसी ही एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक कहानी नेपाल निवासी बालक आरव (परिवर्तित नाम) की सामने आई है, जो अपने परिवार से बिछड़ गया था।

कटनी कलेक्टर श्री आशीष तिवारी द्वारा विगत कई दिनों से किए जा रहे कड़े प्रशासनिक और विधिक प्रयासों के फलीभूत होने से, भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की मदद से मासूम आरव को नई दिल्ली स्थित नेपाल दूतावास को सौंप दिया गया, जहां उसका अपने माता-पिता से सुखद मिलन संपन्न हुआ.

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यह पूरा घटनाक्रम किसी फिल्मी कहानी की तरह शुरू हुआ, लेकिन प्रशासन की सक्रियता ने इसे एक सुखद अंत दिया:

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मासूम को आश्रय देने के बाद उसके वास्तविक माता-पिता और देश की खोज करना एक कड़ा और चुनौतीपूर्ण कार्य था:

  1. भाषा और व्यवहार से खुला राज: बालक की भाषा, व्यवहार और उपलब्ध सूचनाओं के कड़े विश्लेषण के बाद यह स्पष्ट हुआ कि उसका परिवार मूल रूप से नेपाल में निवास करता है।

  2. प्रशासनिक व विधिक समन्वय: अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का मामला होने के कारण कलेक्टर श्री आशीष तिवारी ने खुद कमान संभाली और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अफसरों से सीधा संपर्क व संवाद स्थापित किया।

  3. कानूनी औपचारिकताओं का पालन: किशोर न्याय अधिनियम 2015 (Juvenile Justice Act) के प्रावधानों के अनुरूप एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार कर महिला एवं बाल विकास विभाग के संचालनालय को भेजा गया। इसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और नेपाली दूतावास के बीच कई स्तरों की औपचारिकताओं और कड़े सत्यापन (Verification) के बाद बालक की सुरक्षित घर वापसी का मार्ग विधिक रूप से प्रशस्त हुआ।

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कटनी से नई दिल्ली तक की सुरक्षित यात्रा के बाद, वह पल बेहद भावुक कर देने वाला था जब नई दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास में आरव को उसके माता-पिता के सामने लाया गया। कई दिनों की कड़क चिंता, बेचैनी और इंतजार के बाद जब माता-पिता ने अपने कलेजे के टुकड़े को सही-सलामत सीने से लगाया, तो दूतावास परिसर में मौजूद हर आंख खुशी और राहत के आंसुओं से छलक पड़ी।

बालक के चेहरे पर लौटी मुस्कान और माता-पिता की आंखों की संतुष्टि इस बात का कड़ा प्रमाण बनी कि प्रशासनिक सेवाएं केवल कागजी नियमों का पालन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की रक्षा का भी सबसे बड़ा माध्यम हैं।

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