MP High Court का बड़ा फैसला: सरकारी अनुबंध को एकतरफा रद्द नहीं किया जा सकता, टीकमगढ़ स्वास्थ्य विभाग पर ठोका ₹10,000 का जुर्माना
MP High Court का बड़ा फैसला: सरकारी अनुबंध को एकतरफा रद्द नहीं किया जा सकता, टीकमगढ़ स्वास्थ्य विभाग पर ठोका ₹10,000 का जुर्माना
जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों की मनमानी और एकतरफा कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी निष्पादित (निष्पादित) सरकारी अनुबंध (Contract) को बिना कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) दिए और बिना सुनवाई का उचित अवसर दिए एकतरफा तरीके से रद्द नहीं किया जा सकता।
वर्क ऑर्डर और कॉन्ट्रैक्ट बहाल, अधिकारियों पर 10 हजार की पेनल्टी
हाई कोर्ट की युगलपीठ ने टीकमगढ़ जिले के सब हेल्थ सेंटरों में हाउसकीपिंग सेवाओं से जुड़े अनुबंध को रद्द करने के प्रशासनिक आदेश को सिरे से निरस्त कर दिया है:
कॉन्ट्रैक्ट बहाल: अदालत ने निरस्त किए गए वर्क ऑर्डर और अनुबंध को तत्काल प्रभाव से बहाल करने का आदेश दिया है।
अधिकारियों पर जुर्माना: हाई कोर्ट ने राज्य शासन और संबंधित विभागीय अधिकारियों की लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता कंपनी को 10,000 रुपये की लागत (कॉस्ट) देने के कड़े निर्देश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मामला टीकमगढ़ जिले के उप स्वास्थ्य केंद्रों (Sub Health Centers) में हाउसकीपिंग सेवाओं के टेंडर से जुड़ा हुआ है:
ड्रॉ ऑफ लॉट्स से चयन: टेंडर प्रक्रिया के दौरान दो बोलीदाता (Bidders) पात्र पाए गए थे। दोनों कंपनियों की दरें समान होने पर नियमों के तहत ‘ड्रॉ ऑफ लॉट्स’ के जरिए ‘स्काईबुल सिक्योरिटी सर्विस ओपीसी प्राइवेट लिमिटेड’ का चयन किया गया।
वर्क ऑर्डर जारी: प्रक्रिया पूरी होने के बाद 11 फरवरी 2026 को वर्क ऑर्डर जारी हुआ और 12 फरवरी 2026 को औपचारिक अनुबंध निष्पादित किया गया।
एकतरफा कार्रवाई: इसके बाद संबंधित अधिकारियों ने बिना कोई नोटिस दिए या सुनवाई का मौका दिए अनुबंध को अचानक रद्द कर दिया, जिसके खिलाफ कंपनी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
एक्टिंग चीफ जस्टिस की युगलपीठ ने सुनाया फैसला
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया एवं जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने स्काईबुल सिक्योरिटी सर्विस ओपीसी प्राइवेट लिमिटेड की रिट अपील पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया। अपीलकर्ता कंपनी की ओर से अधिवक्ता अमित कुमार सिंह सेंगर ने मजबूती से पक्ष रखा और प्रशासनिक आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया।