वाराणसी: महाकाल के बाद अब काशी विश्वनाथ में गूंजेगा ‘वैदिक समय’; PM मोदी ने परखी विक्रमादित्य घड़ी की सटीकता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने उत्तर प्रदेश प्रवास के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ का अवलोकन किया। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के बाद अब यह घड़ी बाबा विश्वनाथ के धाम में भी भारतीय समय गणना का परिचय दे रही है।
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क्या है इस घड़ी की खासियत?
यह केवल समय बताने वाली घड़ी नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण डिजिटल पंचांग है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
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वैदिक कालगणना: यह दुनिया की पहली ऐसी घड़ी है जो भारतीय वैदिक समय गणना पर आधारित है।
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सूर्योदय आधारित: जहाँ पश्चिमी GMT आधी रात से दिन की शुरुआत मानता है, वहीं यह घड़ी एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के चक्र पर आधारित है।
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बहुआयामी जानकारी: यह समय के साथ-साथ मुहूर्त, ग्रहों की स्थिति, नक्षत्र, चौघड़िया और सूर्योदय-सूर्यास्त की सटीक जानकारी भी प्रदान करती है।
उज्जैन से काशी तक का सफर
यह घड़ी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा है। उन्होंने इसी महीने की 3 तारीख को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यह घड़ी भेंट की थी, जिसे अगले ही दिन काशी विश्वनाथ परिसर में स्थापित कर दिया गया। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ही 2024 में उज्जैन में इस घड़ी का लोकार्पण किया था।
उज्जैन: प्राचीन ‘प्राइम मेरिडियन’
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव उज्जैन को पुनः दुनिया के ‘प्राइम मेरिडियन’ (मुख्य मध्याह्न रेखा) के रूप में स्थापित करने के प्रयासों में जुटे हैं।
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वैज्ञानिक आधार: उज्जैन कर्क रेखा पर स्थित है, जिससे यहाँ की खगोलीय गणना अत्यंत सटीक मानी जाती है।
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जीएमटी को चुनौती: सीएम यादव का मानना है कि ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) की गणना वैज्ञानिक रूप से उतनी सटीक नहीं है जितनी प्राचीन भारतीय गणना, जो प्रकृति और खगोल विज्ञान के तालमेल पर आधारित है। विक्रमादित्य शोधपीठ द्वारा तैयार यह घड़ी न केवल तकनीक और परंपरा का संगम है, बल्कि यह दुनिया को भारत के प्राचीन खगोलीय ज्ञान से परिचित कराने का एक सशक्त माध्यम बन रही है। काशी विश्वनाथ में इसकी स्थापना से दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालु अब भारतीय ‘काल चक्र’ को साक्षात देख सकेंगे।
क्या आपको लगता है कि भविष्य में स्कूलों और संस्थानों में भी ऐसी वैदिक घड़ियों का उपयोग बढ़ना चाहिए ताकि नई पीढ़ी अपनी गणना पद्धति को समझ सके?

