सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का 20वां दिन: गिरती सेहत पर हाई कोर्ट गंभीर; क्या सरकार अपनाएगी इरोम शर्मिला वाला ‘मैंडेटरी फीडिंग’ का रास्ता?
नई दिल्ली/लेह: लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर दिल्ली में अनशन पर बैठे मशहूर सामाजिक व जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) की भूख हड़ताल का आज 20वां दिन है.
दिन-ब-दिन उनकी सेहत बिगड़ती जा रही है, जिससे अब उनके जीवन पर संकट मंडराने लगा है. डॉक्टरों के मुताबिक, वांगचुक का वजन अब तक 9 किलोग्राम से अधिक गिर चुका है और लंबे समय से अन्न-जल न लेने के कारण उनके शरीर के अंगों (Organs) पर इसका बेहद गंभीर असर पड़ना शुरू हो गया है. इस बीच, दिल्ली हाई कोर्ट ने भी उनकी नाजुक स्थिति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है. सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का 20वां दिन: गिरती सेहत पर हाई कोर्ट गंभीर; क्या सरकार अपनाएगी इरोम शर्मिला वाला ‘मैंडेटरी फीडिंग’ का रास्ता?
“जीवन अमूल्य है…” – दिल्ली हाई कोर्ट ने दिए सख्त निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनम वांगचुक की गिरती सेहत को लेकर गुरुवार को केंद्र सरकार को कड़े निर्देश जारी किए हैं:
-
रोजाना क्लिनिकल मॉनिटरिंग: कोर्ट ने कहा कि देश के हर नागरिक का जीवन अमूल्य है, उसे बचाना सरकार की जिम्मेदारी है.
-
डॉक्टरों की तैनाती: अदालत ने केंद्र को निर्देशित किया है कि सरकारी डॉक्टरों की एक विशेष टीम रोजाना सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की जांच करे और उनकी सेहत पर चौबीसों घंटे पैनी नजर (क्लीनिकल मॉनिटरिंग) बनाए रखे.
इसके बावजूद, वांगचुक अपनी जिद पर अड़े हुए हैं. उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सरकार की तरफ से उनकी मांगों पर कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता, तब तक वे अपना अनशन खत्म नहीं करेंगे. उन्होंने समर्थकों से 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च में शामिल होने की अपील भी की है.
सरकार के पास क्या हैं विकल्प? क्या अपनाया जाएगा इरोम शर्मिला वाला तरीका?
सोनम वांगचुक के अनशन वापस न लेने और हाई कोर्ट की हिदायत के बाद अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी जान बचाने की है. ऐसी स्थिति में प्रशासनिक और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या सरकार वांगचुक की जान बचाने के लिए मणिपुर की ‘आयरन लेडी’ इरोम शर्मिला वाला ऐतिहासिक तरीका अपनाएगी?
क्या था इरोम शर्मिला का मामला और उन्हें कैसे रखा गया 16 साल जिंदा?
मणिपुर से विवादित कानून AFSPA (आफस्पा) को हटाने की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने नवंबर 2000 में दुनिया का सबसे लंबा अनशन शुरू किया था.
अनशन की वजह (मालोम हत्याकांड)
2 नवंबर 2000 को मणिपुर के मालोम में असम राइफल्स की गोलीबारी में 10 बेगुनाह नागरिकों की मौत हो गई थी. इसके विरोध में शर्मिला ने 5 नवंबर 2000 से आमरण अनशन शुरू किया.
खुदकुशी की कोशिश का मामला और गिरफ्तारी
चूंकि भारत में कानूनन खुदकुशी की कोशिश (IPC के तहत) अपराध की श्रेणी में आती थी, पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.
‘नेजोगैस्ट्रिक इंट्यूबेशन’ (नाक के जरिए जबरन फीडिंग)
-
नाक में नली: जब अनशन के 17वें दिन (21 नवंबर 2000) शर्मिला की हालत बेहद नाजुक हो गई, तो डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने के लिए नाक के जरिए सीधे पेट तक जाने वाली नली (Nasogastric Tube) डाल दी.
-
3 फीट लंबी पाइप से जीवन: अगले 16 सालों तक इरोम शर्मिला को अस्पताल के एक विशेष वार्ड में भारी सुरक्षा और डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया. उन्हें इसी 3 फीट लंबी नली के जरिए दिन में तीन बार जरूरी लिक्विड न्यूट्रिएंट्स (तरल पोषक तत्व) और दवाइयां पंप करके जिंदा रखा गया.
16 साल बाद शहद चखकर तोड़ा अनशन
नवंबर 2000 में शुरू हुआ यह ऐतिहासिक अनशन अगस्त 2016 में तब समाप्त हुआ, जब शर्मिला ने मणिपुर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन्होंने अपनी उंगली से शहद चखकर करीब 16 साल बाद पहली बार अपने मुंह से कुछ ग्रहण किया था. सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का 20वां दिन: गिरती सेहत पर हाई कोर्ट गंभीर; क्या सरकार अपनाएगी इरोम शर्मिला वाला ‘मैंडेटरी फीडिंग’ का रास्ता?
वर्तमान स्थिति में क्या यह संभव है?
सोनम वांगचुक के मामले में भी यदि स्थिति और अधिक नियंत्रण से बाहर होती है और उनकी चेतना (Consciousness) या अंगों के फेल होने का खतरा बढ़ता है, तो प्रशासन के पास कानूनी रूप से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर ड्रिप (IV Fluids) देने या गंभीर परिस्थितियों में जबरन लिक्विड फीडिंग (Forced Feeding) कराने का विकल्प मौजूद है.
फिलहाल, सभी की नजरें सरकार के रुख और 20 जुलाई को होने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं.
— विशेष राष्ट्रीय सुरक्षा एवं राजनीतिक ब्यूरो, विशेषांक
