विश्व हिंदू परिषद का दावा, 2018 में ही खुल जाएगा मंदिर निर्माण का रास्ता

याचिकाएं खारिज होने से उम्मीद बंधी
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमाम हस्तक्षेप याचिकाओं को खारिज कर दिया है. और कहा है कि कि अब इसमें प्रकरण में सिर्फ संबंधित पक्ष याने रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड को ही सुना जाएगा. तीसरा पक्ष इसमे दखल नहीं दे सकता.
कोकजे मानते हैं कि इससे वर्ष 2018 में ही मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 90 सुनवाई के बाद विवादित 2.77 एकड़ जमीन को 3 बराबर हिस्से में बांटने का आदेश दिया था. उसके बाद रामलला की जगह तो रामलला विराजमान को मिल गई लेकिन सीता रसोई रामचबूतरा निर्मोही अखाड़े को बाकी हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को मिला.
नजर कानूनी बारिकियों पर
विश्व हिंदू परिषद अब इसके कानूनी पहलुओं को बारिकियों से समझ कर अपना काम रही है. वे कहते हैं कि उनके परिषद के राषट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार भी कानूनविद् है इसलिए जल्द से जल्द मामला निपट सकता है. निसंदेह इस पूरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन अगर कोई कानून बनाकर मामले का हल निकालने की गुंजाइश है तो उसका भी अध्ययन किया जा रहा है.
निर्माण सामग्री बनाने की कार्यशालाएं चल रही
वे कहते हैं कि देश का जनमानस अब पूरी तरह से इस बात का इंतजार कर रहा है कि अयोध्या में रामलला का मंदिर बने. तैयारियों का आलम यह है कि अयोध्या में कार्यशालाएं चल रही हैं जहां निर्माण के लिए मटेरियल तैयार हो रहा है.
वे न तो तिलक काढेंगे न त्रिपुंडी
कोकजे इस बात से साफ इंकार करते हैं कि विश्व हिंदू परिषद का चेहरे बदलने से आंदोलन पर कोई असर होने वाला है. डा तोगडिया, श्री सिंघल की अपनी कार्यशैली थी. उनकी अपनी कार्यशैली होगी. वे खुलकर कहते हैं कि वे न तो माथे पर तिलक काढेंगे और न ही त्रिपुंडी लगाएंगे.
विश्व हिंदू परिषद के नए अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष विष्णु सदाशिव कोकजे
सवाल आस्था का है दिखने का नहीं
हिंदूओं के भी अलग- अलग मत संप्रदाय है,जहां की अलग अलग मान्यताएं हैं. वैष्णव अलग तरीके से तिलक काढ़ते हैं तो शैव अलग. सवाल दिखने का नहीं बल्की आस्था का है.
वे उदाहरण देते हैं कि मैसूर के महाराजा विश्व हिंदू परिषद के फाउंडर रहे वे पश्चिमी लिबास में रहे . उन्होंने कभी इस तरह स्वयं को प्रस्तुतत नहीं किया.
विहिप से करीबी रिश्ता
वे इस आरोप को भी सिरे से खारिज करते हैं कि उनका कोई संबंध विहिप से नहीं रहा. चीफ जस्टिस और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों से मुक्त होने के बाद वे विहिप में सक्रिय होकर उपाध्यक्ष के बतौर अपना काम कर रहे थे.
उपवास सुप्रीम कोर्ट के बाहर करते
डा. प्रवीण तोगडिया के विरोध और उपवास पर उनका कहना है कि किस बात के लिए और किस के लिए यह उपवास हुआ ? अगर राम मंदिर के लिए ही करना था तो सुप्रीम कोर्ट के बाहर बैठते. गांधी नगर में बैठने से क्या होगा.
दुख है परंपरा टूटी
उन्हें दुख है कि इस बार विहिप में एक परंपर टूटी है. और चुनाव लड़ना पडा. लेकिन तोगडिया राघव रेड्डी को फिर से अध्यक्ष बनाना चाहते थे. जिनके दो कार्यकाल हो चुके थे. विहिप के सामने प्रश्न यह था कि या तो चुनाव होने दे या फिर अपने संविधान में बदलाव करे. हमने चुनाव का रास्ता चुना.







