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प्रत्याशी ही नहीं पार्टी और प्राइवेट एजेंसियां भी टटोल रहीं नब्ज

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कटनी। विधानसभा चुनाव 2018 में अभी लगभग एक साल का समय बचा है, लेकिन चुनावी सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। सत्ता हो या विपक्ष सभी के दावेदार एक एक करके मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। ऐसे में हर कोई जो चुनाव लड़ना चाहता है या चुनाव लड़वाना चाहता है। वह जीत-हार के समीकरणों को टटोल रहा है। ऐसे में जासूसी करने वाली निजी एजेंसियों सहित सरकारी खुफिया तंत्र का जमकर उपयोग हो रहा है।

पार्टियां अपने स्तर पर अपनी जमीन तलाश रही हैं तो सरकार भी हवा के रुख को परखने के लिए अपने तंत्र को मैदान में उतार चुकी है। सरकारी तंत्र की खूफिया रिपोर्ट में कटनी जिले की चारों विधानसभाओं में प्रमुख दावेदारों की कुंडली तैयार की जा रही है। सूत्रों की मानें तो पुलिस और प्रशासन का खूफिया तंत्र हर गतिविधियों की रिपोर्ट को संभाल कर रखने में जुट गया है सरकार का इशारा मिलते ही इसे राजधानी में भेजा जाएगा। सिर्फ कटनी जिले की बात करें तो यहां भाजपा का वर्चस्व रहा है। चार में से तीन सीटों पर भाजपा के विधायक काबिज हैं। जानकारी के अनुसार अब तक भाजपा आलाकमान की मिली रिपोर्टों में विजयराघवगढ़, कटनी में भाजपा को अच्छी रिपोर्ट मिल रही हैं जबकि बड़वारा तथा बहोरीबंद में उसे तगड़ी चुनौती मिलने की संभावना है।

कैसा है परफारमेंस
कटनी के 4 विधानसभा क्षेत्रों में से 3 पर भाजपा का कब्जा है और पार्टी कम से कम इस परफार्ममेंस को कायम रखना चाहती है जिसके लिए जरूरी है कि उसे मामूल हो कि किस विधायक ने अपने क्षेत्र में क्या काम किया है और उसकी छवि कैसी है। खुफिया तंत्र उनकी रिपोर्ट तैयार करके पार्टी तक पहुंचाने में लगा हुआ है। पार्टी ही क्यों भाजपा की पितृ संस्था आरएसएस भी पूरी सक्रियता से इस काम में जुट गई है। संघ ने प्रत्येक विधानसभाओं में विस्तारक के रूप में अपने जिम्मेदारों को तैनात किया है जो भले ही देखने में सहज लग रहे हों किन्तु पार्टी से जुड़ी प्रत्येक गतिविधियों पर इनकी पैनी नजर है, जो कमी और खामियां को जानने के लिए जुटे हैं।

सोशल मीडिया पर खास नजर
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सोशल मीडिया पर खासी नजर जमाए हुए है। व्हाट्सअप और फेसबुक पर आने वाली पोस्ट के स्क्रीन शाट भाजपा के जिला कार्यालय के कंप्यूटर में स्टोर किये जा रहे हैं। इसके लिए भाजपा ने अपने दो जिला पदाधिकारियों के साथ कुछ प्राइवेट लोगों को काम पर लगाया है जो सोशल मीडिया पर साइलेंट रूप से ध्यान रख रखते हुए किसी भी अर्नगल पोस्ट या फिर पार्टी विरोधी पोस्ट अथवा किसी अन्य दल की पोस्ट पर ध्यान दे रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस में भी कुछ सक्रिय सोशल मीडिया के नेताओं को वाच के लिए पीसीसी ने लगा दिया है।

चुनावी खर्च भी है वजह
आज के दौर में विधानसभा का चुनाव और टिकट लाना कितना महंगा हो गया है अब उससे हर को वाकिफ है। पार्टी से टिकट लेकर आना और फिर करोड़ों खर्च करने के बाद भी जीत न मिले तो बड़ी क्षति होती है। ऐसे में टिकट के दावेदार अपने स्तर पर जासूसी कराकर अपनी ग्राउण्ड रिपोर्ट जानने में भी काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। हर नेता चाहता है कि जीत के समीकरण बनने पर ही चुनावी मैदान में उतरा जाए।

बाहर की एजेंसियां सक्रिय
इन दिनों चुनावी सर्वे और इनवेस्टीगेशन करने में माहिर एजेंसियां शहर में सक्रिय हैं। चुनावों से एक साल पहले इस तरह की सक्रियता 2013 में भी देखने को मिली थी। अब चुनाव पोलिंग बूथ के साथ साथ वार रूम में भी लड़े जाने लगे हैं जिनको लेकर नेता भी अब सक्रिय व सजग रहते हैं। ऐसे में प्रोफेशनली काम करने वाले लोग बड़े नेताओं के कार्यालय में जमे दिख जाते हैं।

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