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पद्मा का त्यागपत्र, भाजपा ने सिरे से नकारे उपेक्षा के आरोप, कहा- पूरा सम्मान दिया पार्टी ने

कटनी। जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे वैसे-वैसे जिले में राजनैतिक सरगर्मियां भी तेज होती जा रहीं। महत्वकांक्षाएं लेकर राजनीति में सक्रिय कुछ अति महत्वकांक्षी राजनेता पाला बदलकर दूसरे दलों में अपनी संभावनाएं तलाश रहे। नया सियासी घटनाक्रम विजयराघवगढ़ विधासनसभा क्षेत्र में सामने आया है जहां से दो बार भाजपा से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी वरिष्ठ भाजपा नेत्री पद्मा शुक्ला ने आज भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है।

उन्होंने प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह को भेजे अपने इस्तीफे में 2014 से पार्टी द्वारा उनकी उपेक्षा किये जाने का आरोप लगाया है साथ ही राज्य शासन द्वारा उन्हें दिया गया मंत्री पद का दर्जा भी त्यागने की बात कही है। इधर भाजपा संगठन पद्मा शुक्ला द्वारा लगाये गये उपेक्षा के आरोप को पूरी तरह नकार रहा। भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी ने कभी उनकी उपेक्षा नहीं की। संगठन में वे महत्वपूर्ण पदों पर रहीं। दो बार विधानसभा चुनाव में उन्हें प्रत्याशी भी बनाया गया। 2015-16 में उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा देकर मध्यप्रदेश समाज कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष भी बनाया गया। ऐसे में उनके द्वारा उपेक्षा का आरोप लगाया जाना सरासर गलत है।

भाजपा से इस्तीफे के बाद पद्मा शुक्ला ने समर्थकों के साथ छिंदवाड़ा जाकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ से मुलाकात की तथा कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। हालांकि कांग्रेस ज्वाइन करने की तैयारी वे भाजपा छोड़ने से पहले ही कर चुकीं थीं।पिछले 3-4 दशकों से भाजपा की राजनीति में सक्रिय पद्मा शुक्ला मूलतः नरसिंहपुर क्षेत्र की निवासी हैं। कटनी जिले में उनका आना अध्यापिका के रूप में हुआ था। 70 से 80 के दशक में वे कैमोर के श्रमधाम महाविद्यालय में पदस्थ रहीं, कुछ साल अध्यापन के बाद उन्होंने कॉलेज की नौकरी छोड़ दी थी और कटनी के एक अशासकीय विद्यालय में व्याख्याता के रूप में नई नौकरी शुरू कर ली थी। इसी बीच कैमोर निवासी भाजपा नेता शैलेन्द्र शुक्ला के साथ उनका विवाह हो गया।

कुछ साल कटनी के स्कूल में नौकरी के बाद उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी और राजनीति में सक्रिय हो गईं। 1985 के विधानसभा चुनाव में विजयराघवगढ़ से भाजपा के लाल राजेन्द्र सिंह बघेल विधायक चुने गये। उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन विधायक पं. आर के शर्मा को पराजित कर जीत हासिल की थी। बघेल जी के विधायक बनने के बाद शैलेन्द्र शुक्ला एवं पद्मा शुक्ला उनके निरंतर संपर्क में रहे। बघेल जी ने ही शैलेन्द्र शुक्ला को कैमोर एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़वाया और जितवाया था। तब से आज तक कैमोर एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष शैलेन्द्र शुक्ला ही हैं। 1990 के चुनाव में भी राजेन्द्र सिंह बघेल एक बार पुनः विधायक चुने गए पर इस बार शुक्ला दंपत्ति से उनकी पटरी नहीं बैठी। तब तक भाजपा में एक दूसरे राजनैतिक गुट की शुरूआत हो चुकी थी। 1998 के विधानसभा चुनाव आते-आते पद्मा शुक्ला भाजपा की राजनीति में काफी सक्रिय हो चुकीं थीं। भाजपा टिकट के तत्कालीन दावेदार राजेन्द्र सिंह बघेल का उन्होंने काफी विरोध किया और भाजपा की टिकट लाने में कामयाब हो गईं। 1998 में पद्मा शुक्ला का मुकाबला कांग्रेस के सत्येन्द्र पाठक से हुआ जिसमें पद्मा शुक्ला चुनाव हार गईं। इस चुनाव तक पद्मा शुक्ला एवं राजेन्द्र सिंह बघेल के बीच मतभेद इतने गहरे हो चुके थे और विरोध इतना बढ़ चुका था कि भाजपा प्रत्याशी पद्मा शुक्ला के विरोध में राजेन्द्र सिंह बघेल निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतर आए थे।

2003 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने पद्मा शुक्ला की जगह धु्रवप्रताप सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में भाजपा को जीत मिली और धु्रवप्रताप सिंह विधायक चुने गए। हालांकि तब यह आरोप भी लगे थे कि शुक्ला गुट ने चुनाव में भाजपा का काम नहीं किया। 2008 के चुनाव में भी यही स्थिति रही। पूरी कोशिशों के बाद भी पद्मा शुक्ला प्रत्याशी नहीं बन पाई। पार्टी ने पुनः धु्रवप्रताप सिंह को ही प्रत्याशी बनाया और दूसरी बार वे कांग्रेस के संजय पाठक से चुनाव हार गए। 2013 के चुनाव में पार्टी ने एक बार पुनः पद्मा शुक्ला को अपना प्रत्याशी बनाया। इस चुनाव में मुकाबला कड़ा रहा पूरे प्रदेश में मोदी जी और शिवराज सिंह चौहान की लहर रही। बावजूद इसके पद्मा शुक्ला चुनाव नहीं जीत सकी। चुनाव के कुछ ही समय बाद संजय पाठक ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 2014 में संजय पाठक भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और 90 हजार से अधिक मत प्राप्त कर 53 हजार से अधिक मतों एतिहासिक जीत दर्ज की। इतनी बड़ी जीत के चलते ही भाजपा ने संजय पाठक को मंत्रीमंडल में शामिल किया।

वायदा निभाथा मुख्यमंत्री ने
2014 के विधानसभा उपचुनाव के दौरान विजयराघगवढ़ क्षेत्र में मुख्यमंत्री की कई सभाऐं हुई थीं। इन सभाओं में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने हर बार पद्मा जी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया था उन्होंने खुले दिल से स्वीकार किया था कि वे उन्हें प्रत्याशी भले ही न बना पायें हों पर उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आयेगी। चुनाव के बाद मुख्यमंत्री ने अपना यह वादा निभाया भी था। मुख्यमंत्री के आदेश से ही पद्मा शुक्ला को केबिनेट मंत्री का दर्जा देकर उन्हें मध्यप्रदेश समाज कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था। जिस पर वे आज तक काबिज है और इस पद की सारी सुविधाओं का लाभ उठा रहीं थीं। ऐसे में पार्टी पर उपेक्षा के आरोप कितने सही हैं और कितने गलत इसका फैसला अब पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को करना है। हालांकि उनकी राजनैतिक कार्यशैली देखी जाए तो जब-जब विजयराघवगढ़ से भाजपा ने किसी और को प्रत्याशी बनाया तब-तब पद्मा शुक्ला पर भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ में काम करने के आरोप लगते रहे।

पार्टी में कभी उनकी उपेक्षा नहीं हुई- पीताम्बर
इस सिलसिले में भाजपा जिलाध्यक्ष पीताम्बर टोपनानी से जब बात की गई तो उनका कहना था कि पार्टी में श्रीमती पद्मा शुक्ला की कभी उपेक्षा नहीं की गई। हमेशा उन्हें सम्मान दिया गया। वे दो बार जिले में महामंत्री, फिर प्रदेश में मंत्री और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी रहीं। पार्टी ने उन्हें दो बार विधानसभा का टिकट दिया। इसके अलावा वर्तमान में वे कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ समाज कल्याण बोर्ड की चेयरमैन थीं। उनके पति शैलेंद्र शुक्ला भी संगठन के विभिन्न पदों पर रहे। पार्टी ने श्री शुक्ला को भूमि विकास निगम का अध्यक्ष भी बनाया। ऐसे में उनके द्वारा लगाये गए उपेक्षा के आरोप सरासर निराधार हैं।

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