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जनरल प्रमोशन क्यों नहीं: जान की बाजी लगाकर छात्रों को देना पड़ेगी परीक्षा

 

जनरल प्रमोशन ना करने की जिद पता नहीं कितनों की जान लेगी
जान की बाजी लगाकर छात्रों को देना पड़ेगी परीक्षा, भयभीत छात्र और उनके अभिभावक

जबलपुर। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते जी सरकार महाविद्यालय एवं यूनिवर्सिटी के स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं की परीक्षाओं का निर्णय लिया है।

राज्यपाल का कहना है, कि स्नातक एवं स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष की परीक्षाएं 29 जून से शुरू की जाएगी तत्पश्चात द्वितीय वर्ष की परीक्षाएं संपन्न कराए जाएंगे।

तकनीकी क्षेत्र की परीक्षाएं जून माह में संपन्न कराई जाएगी जबकि नया सत्र अक्टूबर माह से शुरू किया जाएगा। आखिर ऐसी कौन सी वजह है कि 60 दिनों के मजबूत लॉक डाउन के बाद सरकार इस तरह का निर्णय लेने जा रही है।

जबकि अभी तक इस महामारी का कोई भी इलाज या वैक्सीन खोजा नहीं गया है और ना ही प्रशासन के पास उचित व्यवस्थाएं मौजूद है । इसके बावजूद छात्रों की सुरक्षा को दरकिनार करते हुए राज्यपाल ने जनरल प्रमोशन ना देने का निर्णय लिया है।

जनरल प्रमोशन क्यों नहीं
जहां महाराष्ट्र एवं दिल्ली सरकार ने वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए कॉलेज के छात्रों का जनरल प्रमोशन करने का निर्णय लिया है, वहीं मध्य प्रदेश सरकार अभी भी जनरल प्रमोशन ना देने की बात कही है

लेट सत्र बढ़ा देगा डिग्री का ड्यूरेशन
अचानक लॉक डाउन के चलते स्कूल एवं कॉलेजों को बंद कर दिया गया था अतः ६० दिन से महाविद्यालय बंद ही है बहुत से कोर्सेज के पाठ्यक्रम तक पूरे नहीं किए गए हैं। ऐसे में अचानक छात्रों के ऊपर परीक्षा की तलवार लटक रही है, जबकि यह सत्र पहले ही बहुत लेट हो चुका है जिसके चलते अगला सत्र पूर्णता प्रभावित होगा फिर भी सरकार द्वारा जनरल प्रमोशन ना देने का निर्णय अगले सत्र को और अधिक लेट करने के लिए उत्तरदाई हो सकता है।

ऑनलाइन क्लासेस भी हुई फेल
वैसे तो बहुत से कॉलेज द्वारा ऑनलाइन क्लासेज लेकर कोर्स कराने की कोशिश की गई है, किंतु ऑनलाइन एप नाही सुरक्षित है । बल्कि सरकार ने इन्हें पूर्णता प्रतिबंधित करने के आदेश दिए हैं, विशेषता साइंस संबंधित विषय विषयों के लिए इस तरह के ऑनलाइन एप व क्लासेस उचित परिणाम देने में असफल रहे हैं।

गाइडलाइन को लेकर भी कुछ साफ नहीं
सरकार द्वारा परीक्षा संपन्न कराने के लिए कुछ महत्वपूर्ण गाइडलाइंस दी गई है, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग एवं सैनिटाइजेशन पर विशेष ध्यान देने की तैयारी है। सरकार के अनुसार छात्रों को परीक्षा केंद्र में सोशल डिस्टेंसिंग का पूर्णतया ध्यान रखा जाएगा एवं उनके सैनिटाइजेशन का भी ध्यान रखा जाएगा। छात्रों को परीक्षा हॉल में परीक्षा के दौरान मास्क पहनना होगा और केवल पीने के पानी की बोतल ले जाने की अनुमति दी जाएगी परीक्षा कई पालीयों में संपन्न कराई जाएगी ताकि सोशल डिस्पेंसिंग का पालन किया जा सके।

निजी कॉलेज को सेंटर बनाया जाएगा-
सरकार का कहना है, की परीक्षा संपन्न कराने के लिए दी गई गाइडलाइंस का पालन करते हुए निजी कॉलेजों को भी परीक्षा का केंद्र बनाने का निर्णय लिया गया है । किंतु सवाल यह उठता है, कि बहुत से निजी कॉलेजों में तो पहले से ही परीक्षाएं होती रही है। फिर सरकार का इस तरीके का कथन वास्तविक है या सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने का कोई नया तरीका है।

दूसरे जिलों से आने वाले छात्रों की क्या है व्यवस्था
छात्रावास में रहने वाले बहुत से छात्र अपने घर जा चुके हैं, क्योंकि उनके खाने और रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी। बहुत से मकान मालिकों ने इन्हें अपने घर में रखने से भी मना कर दिया था । अतः क्या अचानक राज्यपाल द्वारा परीक्षा के निर्देश दिए देने के बाद छात्रों को आने जाने, छात्रावास में रहने और खाने की व्यवस्था क्या सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी?

क्या परीक्षा के पहले प्रत्येक छात्र होगा क्वॉरेंटाइन!
जैसा कि हम सभी जानते हैं, कि कहीं भी बाहर से आने वाले व्यक्ति को 14 दिनों के लिए क्वॉरेंटाइन किया जाता है। तो क्या परीक्षा के पहले प्रत्येक छात्र को क्वॉरेंटाइन किया जाएगा? वैसे भी बाहर से आने वाले लोगों को लेकर के प्रशासन का रवैया उदासीन रहा है। ना ही शहर में आने जाने वालों का कोई रिकॉर्ड रखा गया है, और ना ही पर उन पर किसी तरह का पाबंद लगाया गया है। बहुत से लोग जो एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन करते रहे हैं, उन्हें भी 14 दिन के लिए क्वॉरेंटाइन करने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। और ना ही किसी तरह का रिकॉर्ड मेंटेन किया गया है। ऐसे में परीक्षा के पहले, परीक्षा के दौरान एवं परीक्षा के पश्चात इतने सारे छात्रों के क्वॉरेंटाइन करने की व्यवस्था सरकार कर पाएगी?

ऑनलाइन परीक्षा भी हो सकता था अच्छा विकल्प
जहां सरकार द्वारा लगातार दो महीने से शिक्षकों पे ऑनलाइन क्लासेस के लिए दबाव बनाया गया तो सवाल यह उठता है, कि अब सरकार द्वारा ऑनलाइन परीक्षा कराने का निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा है? सरकार चाहे तो ऑनलाइन परीक्षा लेकर भी इस विपदा से आसानी से निकल सकती हैं, फिर भी सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय संदेहास्पद है।

एनएसयूआई ने की थी
एनएसयूआई दल द्वारा पहले भी यूनिवर्सिटी और कलेक्ट्रेट में लिखित परीक्षा ना कराने हेतु ज्ञापन सौंपा जा चुका है। एक आम आदमी की तरह छात्रों एवं उनके अभिभावकों के मन में भी इस महामारी को लेकर डर बैठा हुआ है। इस दहशत भरे माहौल में इस प्रकार लिखित परीक्षा कराया जाने का निर्णय अत्यंत सोचनीय विषय है।

जहां इतनी सारी अव्यवस्था और परेशानियों के चलते सरकार छात्रों के संबंध में इस प्रकार का निर्णय ले रही हैं। 60 दिन तक सरकार ने लॉक डाउन के चलते जनता को घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा रखी थी वही अचानक लॉक डाउन के बाद के इस प्रकार का निर्णय सभी के मन में संदेह पैदा कर रहा है अगर परीक्षा के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही की जाती है और कोरोनावायरस संक्रमण फैलता है तो आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी कॉलेज प्रिंसिपल की, वॉइस चांसलर की या सरकार की ? क्या बड़े बड़े अधिकारी राजनेता अपने बच्चों को भी इस तरह से भीड़ में भेजना स्वीकार करेंगे ?आखिर लोगों के इतने दिन के त्याग और बलिदान के बाद अगर अचानक से को रोना संक्रमण बढ़ता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा ? आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है सरकार की, कि वह इतनी बड़ी लापरवाही लेकर आम जनता के जीवन से खेलने का निर्णय लेने के लिए तैयार है।

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