ऐसा है एमपी में टिकट बांटने के लिए कांग्रेस पार्टी का फॉर्मूला
नई दिल्ली। प्रदेश में 15 साल से सत्ता से दूर रही कांग्रेस अब मिशन 2018 को पूरा करने के लिए अपने ही दावेदारों के ‘दस का दम’ देखेगी. हाईकमान ने विधानसभा टिकट के लिए फॉर्मूला भी तय कर दिया है. दस का दम दिखाने वाले को ही पार्टी टिकट थमाकर मैदान में उतारेगी.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद कमलनाथ ने साफ कर दिया था कि जो उम्मीदवार जिताऊ होगा, उसे ही विधानसभा का टिकट दिया जाएगा. टिकट वितरण से पहले हाईकमान ने भी दावेदारों के लिए यही फॉर्मूला फिक्स कर दिया है. यानी टिकट हासिल करने के लिए उसे सबसे पहले पार्टी को दस का दम दिखाना पड़ेगा.
दस का दम ये है कि विधानसभा चुनाव 2008 और 2013 में हारने वाले उम्मीदवारों को पार्टी किसी भी हाल में टिकट नहीं देगी. दूसरी बात ये कि 2013 में 20 हजार से ज़्यादा मतों से हारने वाले प्रत्याशी को टिकट नहीं मिलेगा. अगर एक ही परिवार से दो अलग-अलग सदस्यों को अवसर मिला और वो पराजित हुए हैं, तो अब उन्हें इस बार मौका नहीं दिया जाएगा. शर्त ये भी है कि वर्तमान विधायक के ख़िलाफ अगर लोकसभा प्रत्याशी ने शिकायत की है, तो उसकी पूरी समीक्षा के बाद ही तय किया जाएगी कि टिकट दिया जाए या नहीं.
टिकट के दावेदार के परिवार का कोई सदस्य अगर भाजपा का पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि है, तो उसकी भी समीक्षा की जाएगी. पैनल में नाम तय करने के बाद टिकट तय होगा. पार्टी इस बात पर भी विचार करेगी कि नए सदस्य जो भाजपा या दूसरी पार्टियों से कांग्रेस में आए हैं, उन्हें टिकट देने से बाक़ी सीटों पर क्या सकारात्मक या नकारात्मक असर पड़ेगा. इसकी भी समीक्षा करने के बाद स्थानीय नेताओं की सर्वसम्मति से टिकट दिया जाएगा. विधानसभा क्षेत्र में एक ही प्रभावशाली जाति विशेष का प्रत्याशी अगर लगातार दो बार से हार रहा है तो समीक्षा के बाद अन्य जाति के उम्मीदवार को टिकट में प्राथमिकता मिलेगी.
जिन सीटों पर लगातार तीन या अधिक बार से पार्टी विधानसभा चुनाव हार रही है, वहां की समीक्षा अलग से की जाएगी. उन सीटों पर पार्टी के युवा या अन्य सामाजिक क्षेत्र से कांग्रेस विचारधारा वाले सोशल वर्कर-आरटीआई एक्टिविस्ट हों तो उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी.

