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इस बार नहीं हो पाएगी टिकटों की बंदरबांट, कांग्रेस तो चली संघ की चाल

भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस का माहौल बता रहा है कि इस बार यहां टिकट की बंदरबांट नहीं हो पाएगी. इसकी वजह है सीधे राहुल गांधी ऑफिस का दख़ल और टिकट वितरण के तय फॉर्मूले. जिसे तोड़ना अब किसी भी बड़े नेता के लिए संभव नहीं है. इन सबसे अलग एक ख़ास मामला इस बार और भी है. वो है कांग्रेस के 150 से ज़्यादा पर्यवेक्षक, जिन्होंने किसी भी बड़े नेता या गुट के प्रभाव में ना आकर अपनी ज़मीनी रिपोर्ट संगठन को दी है.

ना गाड़ी है ना सुविधा

ये पर्यवेक्षक 6 महीने से मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों पर तैनात हैं. मीडिया से दूर, प्रचार से बाहर इन पर्यवेक्षकों की कार्यशैली राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरह है. बहुत ही साधारण होटल में या अपने किसी व्यक्तिगत परिचित के यहां रुक कर वो अपना काम कर रहे हैं. उनके पास ना तो कोई गाड़ा है ना कोई ख़ास सुविधा. वो अपने इलाकों में या तो पैदल घूम रहे हैं या फिर किसी कार्यकर्ता की दो पहिया गाड़ियों पर सवार हैं. वो कांग्रेस और उसके प्रत्याशी के लिए फीडबैक ले रहे हैं. किसी बस्ती में घूमकर लोगों से मिल रहे हैं, तो कभी किसी पान की दुकान पर जाकर बतिया रहे हैं. किसी कार्यकर्ता के यहां भोजन के लिए जाकर उस इलाके की टोह ले रहे हैं. गांवों में चौपालों पर किसानों की बात सुन रहे हैं तो बिना किसी को बताए इलाके के लोगों से मिलकर उम्मीदवारों का कच्चा चिट्‌ठा खुलवा रहे हैं.

फीडबैक लेना

कांग्रेस संगठन ने एक ज़िले को दो हिस्सों में बांटा है. ग्रामीण और शहरी इलाका. इन लोगों को उम्मीदवारों के चयन से पहले ग्राउंड रिपोर्ट देना था. उस क्षेत्र के लोगों से मिलना, उनसे कांग्रेस और उम्मीदवारों का फीडबैक लेना. जनता से मिले फीडबैक को संगठन तक पहुंचाना. क्षेत्र में कौन जीतने वाला उम्मीदवार हो सकता है ? जनता की राय लेकर ये संगठन को बताना.

स्क्रीनिंग कमेटी तक पहुंची रिपोर्ट

प्रदेश की पूरे 230 विधानसभा सीटों की ये रिपोर्ट संगठन के ज़रिए स्क्रीनिंग कमेटी तक पहुंचाई गई है. वहां उम्मीदवारों के नाम तय किए जा रहे हैं. इस पूरे मामले में एक दिलचस्प पहलू महिला पर्यवेक्षकों का भी है. अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की ज़िम्मेदार पदाधिकारियों को भी पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया है. उनका मकसद प्रदेश में महिला उम्मीदवारों के बारे में जानकारी इकट्टा करना है. ये महिलाएं भी प्रदेश के कई ज़िलों में घूम रही हैं.

महिलाओं को टिकट

गुजरात से मध्यप्रदेश आई महिला कांग्रेस सचिव ने  बताया कि वो अब तक 22 ज़िलों का दौरा कर चुकी हैं. युवा महिला नेतृत्व को आगे लाने की कोशिश है. टिकटों की दावेदारी में महिला नेताओं के नाम सामने आए. कई युवा चेहरे दिखाई दिए. ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाके में इतनी मुखर और पढ़ी- लिखी लड़कियां दिखाई दी हैं जो सामाजिक काम करते हुए सामने आई हैं. हमारी कोशिश होगी की ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को टिकट मिले.

दबाव- प्रभाव काम नहीं आया

कांग्रेस के एक पर्यवेक्षक बताते हैं कि इस पूरी कवायद में कई बार ऐसा हुआ कि स्थानीय नेता दबाव- बनाते रहे. जब उन्हें बताया गया कि यह दबाव- प्रभाव का रिकॉर्ड भी ऊपर भेजा जा सकता है, इसके बाद वो सहज होकर अपनी दावेदारी ठोकने लगे. पार्टी के कई ज़िलाध्यक्षों पहले तो सहयोग के लिए तैयार नहीं थे. वो सोचते थे ये पर्यवेक्षक किस खेत की मूली हैं. क्यों नेताओं की लिस्ट विधानसभा की जानकारी मांग रहे हैं? इससे क्या होगा.? बाद में उन्हें प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया ने समझा दिया कि अगर इन्हें सहयोग नहीं किया तो ज़िलाध्यक्ष ही बदले जा सकते हैं. कई नेता इस भरोसे में दिखाई दिए कि उन्हें किसी पर्यवेक्षकों को महत्व देने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि वो सीधे बड़े नेता से जुड़े हुए हैं. इस पर संगठन ने उन्हें चेताया कि इस बार मामला अलग है. आपका टिकट आपके नेता नहीं संगठन की रिर्पोट तय करेगी.

बड़े नेताओं पर ब्रेक लगा

पर्यवेक्षकों के अनुसार हमने अभी तक जो देखा है वो तटस्थ होकर रिपोर्ट किया है. मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी खामी गुटबाज़ी है. पिछला चुनाव भी कांग्रेस इस वजह से हार चुकी है. इस बार उस गलती को सबसे पहले ठीक करने का प्रयास हो रहा है. इसमें बहुत हद तक सफलता भी मिली है. राहुल गांधी जब ज़िलाध्यक्षों से सीधी बात कर रहे हैं तो इससे बड़े नेताओं की मनमानी पर भी ब्रेक लग गया है. उनकी सीधी शिकायतें राहुल गांधी तक पहुंच रही हैं. संभव है कई चौंकाने वाले नाम और टिकट इस बार दिखाई दे.

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम

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