Latest

OPINION: ‘सुप्रीम कोर्ट की गरिमा बचाने के लिए एकजुट हों जज’

नेशनल डेस्‍क। 1949 में डॉ. बी.आर आम्बेडकर ने एक बहस के दौरान कहा था कि वैसे तो भारत का चीफ जस्टिस एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होता है लेकिन आखिरकार होता तो इंसान ही है, जिसमें सारी भावनाएं, संवेदनाएं आम इंसानों जैसी ही होती है. सीजेआई विवाद को देखकर लगता है कि आम्बेडकर एकदम सही थे. लेकिन किसी दूसरे पक्ष में वे गलत भी हो सकते है।

अपनी बहस में आम्बेडकर इस बात पर भी डटे रहे कि न्यायपालिका बहुत हद तक कार्यकारी से संबंधित नहीं है बल्कि लोगों के अधिकारों से संबंधित है, जिसमें आज की सरकार की बमुश्किल ही कोई दिलचस्पी है. आम्बेडकर के मुताबिक, कार्यकारी की वजह से न्याय व्यवस्था का प्रभावित होना कोई बड़ी बात नहीं है. कहीं न कहीं उसी दौर में आम्बेडकर की दूरदर्शिता ने आगाह कर दिया था कि जज, न्यायपालिका में सरकारी दखलअंदाजी की शिकायत कर सकते हैं ।

संविधान बनाने वालों ने न्याय व्यवस्था की धाराओं को संविधान में डालने से पहले इसके हर संभव पहलू पर विस्तृत बहस की. लेकिन तब से अब तक काफी कुछ बदल गया है. इनमें से कुछ बदलाव तो सरकारी दखल से हुए है और कुछ बदलाव न्यायिक आदेश के परिणास्वरूप किए गए है. भारत के इतिहास में पहले कभी न हुआ और न देखा गया वाली स्थिति से आज हम रू-ब-रू होरहे हैं।

जबसे (1950 से) सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई है, तब से पहली बार भारत के 45वें सीजेआई को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाया गया. हालांकि इस प्रस्ताव को उप-राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया.
देश का सबसे बड़े कोर्ट आज एक सामान्य संस्थान जैसा नज़र आ रहा है, जहां अलग-अलग पदों पर बैठे लोगों में प्रशासनिक और दूसरे मुद्दों पर मतभेद साफ दिख रहा है. यहां सीजेआई और दूसरे वरिष्ठ जजों के बीच असहजता साफ तौर पर नज़र आ रही है.

मेरे जैसा रिपोर्टर जो अपना ज्यादातर समय कोर्टरूम और सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में बिताता है, उसकी इस मुद्दे पर एक ही चिंता है- न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास. उनका विश्वास जो इस न्याय की इमारत को मंदिर की तरह छूना नहीं भूलते, उनका विश्वास जो कोर्टरूम में घुसते ही सम्मान से अपने हाथ जोड़ना नहीं भूलते, उनका विश्वास जो अपनी सुनवाई के समय धार्मिक किताबे साथ लेकर प्रर्थना करते रहते हैं. इन सब से उपर उन लोगों का विश्वास जो केस हारने के बाद भी न्यायव्यवस्था में अपना भरोसा बनाए रखते है क्योंकि वो मानते है कि जज कभी भी गलत नहीं करता.

खेमो में बटे आज के सुप्रीम कोर्ट और उसके विवाद के बाहर आने से न्याय के मंदिर से लोगों का विश्वास उठ सा गया है. सुप्रीम कोर्ट के हर वरिष्ठ जज की जिम्मेदारी होती है कि संस्थान की मर्यादा, प्रतिष्ठा और अच्छाई को बचाए रखने में अपना पूरा योगदान दे. हर जज संविधान के प्रति अपनी पूरी श्रद्धा और सच्चे विश्वास को बनाए रखने की कसम खाता है. संविधान के लिए खड़े होने से बढ़कर जज का और कोई कर्तव्य नहीं है. हर जज संविधान की गरिमा को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होता है.

अभी सभी जजों को साथ खड़े होकर न्यायपालिका को इस संकट से उबारने की कोशिश करनी चाहिए. क्योंकि अब न्यायपालिका पर लोगों के विश्वास को जीतने की बात है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अमिताव रॉय ने अपनी फेयरवेल स्पीच में अपने साथी जजों से कहा था कि बाहरी ताकते न्यायपालिका को तोड़ने की पूरी कोशिश में है, न्यायपालिका के टूटने का मतलब हमारा विनाश है, क्योंकि हम इस न्यायव्यवस्था के लिए ही जी रहे है. इसीलिए हम सबका साथ खड़ा होना ज़रूरी है. साथ खड़े होकर हमें बता देना चाहिए कि हम एक हैं और एक संगठित इकाई के रूप में स्वंतत्र हैं, निडर हैं और हर समस्या को हल करने में सक्षम हैं. सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को बचाने के लिए प्रधान जजों को रॉय की बातों पर ज़रूर अमल करना चाहिए।

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम

Leave a Reply