NGO के शिकंजे में फंसे स्कूल, यहां राज्य के सवा दो लाख शिक्षकों पर गैर सरकारी संगठन के विद्वान हावी

रायपुर। स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) का चौतरफा घेरा बन चुका है। चाहे स्कूली बच्चों को पढ़ाने का मामला हो या फिर शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का। और तो और यहां लेखन के काम में भी राज्य के सवा दो लाख शिक्षकों पर गैर सरकारी संगठन के विद्वान हावी हैं। नईदुनिया ने पड़ताल में पाया कि सरकारी संस्थानों में एनजीओ का खूब बोलबाला है। बहुत सारे संस्थान अलग-अलग जिलों में अपना प्रयोग कर रहे हैं।
पुस्तक के लेखन काम में हावी
राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) का काम किताब लेखन का है। पहली से लेकर बारहवीं तक के किताब लेखन में जुटे इस संस्थान में कुछ ही सरकारी स्कूलों के शिक्षक शामिल हैं, बाकी एनजीओ के भरोसे ही सारा काम चलता है। पिछले सालों में जो किताबें अपडेट हुईं उनमें दिगंतर, विद्या भवन सोसाइटी, एकलव्य, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, आइसीसी फाउंडेशन आदि ने काम किया।
इनके औचित्य पर सवाल
विशेषज्ञों के मुताबिक राज्य में बच्चों के किताब लेखन के लिए एससीईआरटी और जिलों के डाइट्स के औचित्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि शिक्षा स्तर को सुधारने में कमजोर साबित हो रहें हैं। लिहाजा गैर सरकारी संगठनों की मदद लेना मजबूरी बन गई है।
शाला त्यागियों के लिए किताब
सर्व शिक्षा अभियान के तहत शाला त्यागी बच्चों के लिए हुमाना पीपुल टू पीपुल इंडिया की ओर से प्रस्तावित किताब कदम को छपवाकर पढ़ाया जा रहा है। दावा किया जाता है कि शाला त्यागियों के लिए इस एनजीओ की किताब बेहतर है। यह हरियाणा की संस्था है। रूम टू रीड संस्था बच्चों को लाइब्रेरी में किताबें उपलब्ध करा रही है।
शिक्षकों को ट्रेनिंग देने में दबदबा
राज्य के शिक्षकों को ट्रेनिंग देने के लिए एससीईआरटी और डाइट्स की व्यवस्था है, लेकिन एनजीओ यहां भूमिका निभा रहे हैं। एलएलएफ यानी लर्निंग लैंग्वेज फाउंडेशन शिक्षकों को ट्रेंड होने का सर्टिफिकेट देता है। चॉकलेट संस्था शरीर प्रताड़ना किये बगैर बच्चों को पढ़ाने का गुर सिखाता है। द टीचर एप संस्थान द टीचर एप के जरिए शिक्षकों को ऑनलाइन ट्रेनिंग देता है।
अजीम प्रेमजी फाउंडेशन शिक्षकों को टीचर्स प्रोफेशनल डेवेलपमेंट में काम कर रहा है। रायपुर, रायगढ़, बलौदाबाजार, बेमेतरा, धमतरी और जांजगीर चांपा में टीचर्स के लिए प्रोग्राम चलते हैं। आइएफआइजी शिक्षकों में लैग्वेज का काम रहा है। इंडिया एजुकेशन कलेक्टिव संस्था महासमुंद और बस्तर में क्लासरूप पेडोगाजी काम करती है।
पठन-पाठन में भी दखल, आउटसोर्सिंग
संपर्क क्लास के जरिए अंग्रेजी और गणित के लिए किट दी जा रही है। वहीं बाधवानी फाउंडेशन की ओर राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) में वोकेशनल कोर्स के लिए इस संस्थान के मॉड्यूल पर काम हो रहा है। आउटसोर्सिंग के जरिये वोकेशनल की पढ़ाई चल रही है। लर्निंग लिंक फाउंडेशन और मैजिक बस फाउंडेशन दोनों संस्थान मिलकर दिशा कार्यक्रम चला रहे हैं। राज्य के 89 मिडिल स्कूल में इसमें संज्ञानात्मक और सह संज्ञानात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं।
मूल्यांकन पर भी फोकस
आरटीई वाच और प्रथम संस्था बच्चों के उपलब्धि स्तर और मूलभूत सुविधाओं को जांचते हैं।
सूक्ष्म प्रभाव के लिए जरूरी
स्कूली शिक्षा में इन संस्थाओं का सूक्ष्म प्रभाव है। किसी भी संस्था से मदद लेने में कोई गलत नहीं है। मैं इसे सकारात्मक रूप से देखता हूं। इसके परिणाम भी बेहतर आएंगे। बहुत से संस्थान प्रदेश के कई जिलों में काम कर रहे हैं। – एस प्रकाश, संचालक, लोक शिक्षण संचालनालय








