मातृत्व कुदरत का एक वरदान और आशीर्वाद High Court, जानें पूरा मामला
मातृत्व कुदरत का एक वरदान और आशीर्वाद High Court, जानें पूरा मामला

Uttarakhand High Court on Motherhood: मातृत्व कुदरत का एक वरदान और आशीर्वाद High Court, लोकतंत्र में संविधान सर्वोच्च होता है. विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका इसके आधार स्तंभ है. सरकार संविधान का ध्यान रखती है तो विपक्ष समय-समय पर संविधान की दुहाई देता रहता है. संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ. बदलते समय की जरूरतों के हिसाब से संविधान में भी बदलाव हुए. मोदी सरकार खुद अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे सैकड़ों नियम कानून बदल चुकी है. इसके बावजूद आज भी भारत में कुछ नियम ऐसे हैं, जो संविधान से मेल नहीं खाते हैं. ऐसे ही एक मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए एक नियम को रद्द कर दिया.
मातृत्व कुदरत का आशीर्वाद: HC
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उस नियम को रद्द कर दिया जो गर्भवती महिलाओं को सरकारी नौकरियों के लिए उपयुक्त मानने से रोकता था. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा, ‘मातृत्व कुदरत का वरदान और आशीर्वाद है, इसके कारण महिलाओं को रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता है.’ कोर्ट का ये फैसला मीशा उपाध्याय द्वारा लगाई गई उस याचिका के जवाब में आया, जिसमें उसकी प्रेग्नेंसी की वजह से नैनीताल के बीडी पांडे अस्पताल में नर्सिंग अफसर के पद पर तैनाती देने से वंचित कर दिया गया था.
जानिए पूरा मामला
टीओआई में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक दरअसल चिकित्सा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के महानिदेशक द्वारा ज्वाइनिंग लेटर जारी किए जाने के बावजूद, अस्पताल प्रशासन ने फिटनेस सर्टिफिकेट का हवाला देते हुए उन्हें ज्वाइनिंग देने से इनकार कर दिया था. मैनेजमेंट ने उन्हें भारत सरकार के एक गजटरी नियम के तहत ज्वाइनिंग के लिए अस्थायी रूप से अयोग्य पाया था, जबकि उन्हें प्रेग्नेंट होने के अलावा और कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं थी.
यह निश्चित रूप से अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन: HC
जस्टिस पंकज पुरोहित की सिंगल बेंच ने शुक्रवार को अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिया कि वो तत्काल यह सुनिश्चित करें कि 13 सप्ताह की गर्भवती याचिकाकर्ता नर्सिंग अधिकारी मीशा जल्द से जल्द अपनी नौकरी ज्वाइन करें. कोर्ट ने इस नियम को लेकर भारत के राजपत्र में दर्ज (असाधारण) नियमों पर भी गहरी नाराजगी जताई. जिसमें 12 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था वाली महिलाओं को ‘अस्थायी रूप से अयोग्य’ के रूप में लेबल किया गया है.








