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Lucknow Mayor Big Blow: अदालत की एक ‘ना’ और पावरफुल मेयर की कुर्सी हुई बेअसर, न साइन कर पाएंगी न फैसला; जानें क्या है ये बड़ी इनसाइड स्टोरी

Lucknow Mayor Big Blow: अदालत की एक ‘ना’ और पावरफुल मेयर की कुर्सी हुई बेअसर, न साइन कर पाएंगी न फैसला; जानें क्या है ये बड़ी इनसाइड स्टोरी

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज खबर आ रही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से सीज (Freeze) कर दिए हैं।

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अदालत ने यह सख्त कार्रवाई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एक निर्वाचित पार्षद को पद की शपथ न दिलाने (Defiance of Court Orders) के कारण की है। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक निर्वाचित पार्षद को उनके पद की शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर सुषमा खर्कवाल के तमाम अधिकार पूरी तरह से सीज रहेंगे।

⚖️ क्या है पूरा मामला? क्यों नाराज हुई अदालत? (The Core Issue)

यह पूरा विवाद लखनऊ नगर निगम के वॉर्ड संख्या-73 (फैजुल्लागंज) से जुड़ा हुआ है:

  • न्यायाधिकरण का फैसला: हाई कोर्ट की अवध बार एसोसिएशन के महामंत्री ललित तिवारी ने पार्षद चुनाव को चुनौती दी थी। बीते साल 19 दिसंबर 2025 को चुनाव न्यायाधिकरण (सत्र अदालत) ने वॉर्ड-73 के तत्कालीन पार्षद प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन शून्य घोषित करते हुए ललित तिवारी को नया पार्षद निर्वाचित घोषित किया था।
  • 5 महीने तक नहीं दिलाई शपथ: ललित तिवारी का आरोप है कि इस फैसले के 5 महीने बीत जाने के बाद भी नगर निगम प्रशासन और मेयर द्वारा उन्हें पार्षद पद की वैधानिक शपथ नहीं दिलाई गई।
  • अपील का दिया बहाना: नगर निगम की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ उनकी प्रथम अपील अभी कोर्ट में लंबित है। इसलिए विधिक स्थिति साफ न होने के कारण शपथ नहीं दिलाई गई।

 सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत; सीनियर एडवोकेट ने रखा पक्ष

इस मामले में मेयर और नगर निगम प्रशासन का पक्ष पहले ही हाई कोर्ट और देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) दोनों जगह से राहत पाने में पूरी तरह असफल रहा था। दोनों बड़ी अदालतों से झटका लगने के बावजूद जब आदेश का पालन नहीं हुआ, तो हाई कोर्ट की बेंच ने इसे न्यायपालिका की सीधी अवहेलना माना।याचिकाकर्ता ललित तिवारी की ओर से कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) गौरव मेहरोत्रा ने मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि किस तरह जानबूझकर अदालती आदेश को दरकिनार किया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा:

“स्थानीय निकायों (Local Bodies) को भी हर हाल में न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होगा। आदेश की अवहेलना को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

 लखनऊ नगर निगम पर क्या पड़ेगा असर?

मई 2023 से लखनऊ की मेयर और बीजेपी की तेजतर्रार नेता रहीं सुषमा खर्कवाल के अधिकार सीज होने से लखनऊ नगर निगम (LMC) में एक बड़ा प्रशासनिक संकट खड़ा हो सकता है।मेयर के हस्ताक्षर और अनुमति के बिना नगर निगम में कोई भी बड़ी वित्तीय स्वीकृति (Financial Approval) नहीं हो सकेगी।शहर के विकास कार्यों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण फाइलें, टेंडर प्रक्रियाएं और बड़े प्रशासनिक फैसले अधर में लटक सकते हैं।इस फैसले ने साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी जनप्रतिनिधि या संस्था अदालत के आदेशों से ऊपर नहीं है। अब देखना यह होगा कि मेयर प्रशासन कितनी जल्दी ललित तिवारी को शपथ दिलाकर अपने अधिकारों को बहाल कराता है।

Usha Pamnani

20 वर्षों से डिजिटल एवं प्रिंट मीडिया की पत्रकारिता में देश-विदेश, फ़िल्म, खेल सहित सामाजिक खबरों की एक्सपर्ट, वर्तमान में यशभारत डॉट कॉम में वरिष्ठ जिला प्रतिनिधि