भारत का बड़ा रक्षा सौदा: ₹4,106 करोड़ की डील से वायुसेना को ‘GSAT-7C’ और नौसेना को मिलेगा ‘वरुणास्त्र’

भारत का बड़ा रक्षा सौदा: ₹4,106 करोड़ की डील से वायुसेना को 'GSAT-7C' और नौसेना को मिलेगा 'वरुणास्त्र'

भारत का बड़ा रक्षा सौदा: ₹4,106 करोड़ की डील से वायुसेना को ‘GSAT-7C’ और नौसेना को मिलेगा ‘वरुणास्त्र’

नई दिल्ली: भारतीय सुरक्षा बलों की मारक क्षमता और रणनीतिक कौशल को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्रालय ने ₹4,106 करोड़ से अधिक की लागत वाले दो बड़े रक्षा समझौतों पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए हैं। ‘आत्मनिर्भर भारत’ और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई इस डील के तहत वायुसेना को अत्याधुनिक संचार उपग्रह और नौसेना को घातक हेवी-वेट टॉरपीडो मिलेंगे।

1. भारतीय वायुसेना के लिए GSAT-7C सैटेलाइट (₹2,563 करोड़)

रक्षा मंत्रालय ने बेंगलुरु स्थित न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के साथ यह अनुबंध किया है।

  • सशक्त संचार प्रणाली: यह वायुसेना के लिए एक विशेष और सुरक्षित कम्युनिकेशंस सैटेलाइट प्रोजेक्ट है।

  • रणनीतिक बढ़त: इससे लड़ाकू विमानों, ड्रोन और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म्स के बीच ‘लाइन ऑफ साइट’ (Line of Sight) से परे भी सुरक्षित और निर्बाध संपर्क बना रहेगा।

  • नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर: आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार यह उपग्रह सटीक तालमेल और त्वरित निर्णय लेने में मदद करेगा।

2. भारतीय नौसेना के लिए ‘वरुणास्त्र’ टॉरपीडो (₹1,543 करोड़)

समुद्र के भीतर मारक क्षमता बढ़ाने के लिए भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) हैदराबाद के साथ दूसरा समझौता हुआ है।

  • पूर्णतः स्वदेशी: इसे DRDO की ‘नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लैबोरेटरी’ (NSTL) द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है।

  • अचूक मारक क्षमता: यह जहाज से लॉन्च किया जाने वाला एंटी-सबमरीन टॉरपीडो है, जो गहरे और उथले दोनों तरह के पानी में दुश्मन की पनडुब्बियों को नष्ट कर सकता है।

‘वरुणास्त्र’ की प्रमुख तकनीकी विशेषताएं:

  • रेंज: लगभग 40 किलोमीटर तक सटीक निशाना।

  • गति: 40 नॉट (लगभग 74 किमी/घंटा) की तेज रफ्तार।

  • अकॉस्टिक होमिंग तकनीक: ध्वनि तरंगों के जरिए दुश्मन की पनडुब्बी को ढूंढकर उसके काउंटरमेजर्स को चकमा देने में सक्षम।

‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा बढ़ावा

रक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव और महानिदेशक (अधिग्रहण) ए. अनबरासु की उपस्थिति में इन समझौतों को अंतिम रूप दिया गया। इन स्वदेशी तकनीकों के शामिल होने से सामरिक क्षेत्र में विदेशी निर्भरता काफी कम होगी और भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को नई गति मिलेगी।