FEATUREDLatestधर्म

Govardhan Puja 2018: जानिए गोर्वधन पूजा का महत्‍व, कैसे श्रीकृष्ण ने तोड़ा था इंद्र का घमंड

धर्म डेस्‍क। दीपावली की अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। ये त्यौहार अन्नकूट के नाम से भी प्रसिद्ध है। गोर्वधन पूजा का भारतीय लोकजीवन में काफी महत्व है, क्योंकि पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा संबंद दिखाई देता है। विशेष रूप से जब गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों आैर खाद्य वस्तुआें की पूजा की जाती है।

शास्त्रों के अनुसार, गाय उतनी ही पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं।

इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की पूजा होती है।

अन्नकूट के रूप में मनाने का कारण

जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकायें उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तब इस उत्सव में छप्पन भोग बनाने की परंपरा प्रारंभ हुर्इ। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

कहते हैं कि श्रीकृष्ण को उनकी मां आठ प्रहर भोजन कराती थीं। सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को उठाए रखने के कारण कृष्ण ने भोजन नहीं किया। लिहाजा, जब आठवें दिन सब सही हुआ, तो सात दिन के आठ प्रहर के हिसाब से 56 भोग बनाए गए, तभी से 56 भोग की परंपरा भी शुरू हुई।

यह है इंद्र का घमंड तोड़ने की कहानी

भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में गोवर्धन पर्वत को नख पर उठाने की उनकी यह लीला काफी चर्चित है। श्रीकृष्ण जब सुबह सोकर उठे तो देखा कि उनकी यशोदा मैया अपने मुंह पर पट्टी बांधकर कई तरह के पकवान बना रही हैं। कन्हैया ने तब पकवान खाने को मांगे, तो यशोदा जी ने मना कर दिया।

इस पर बाल कृष्ण नंद बाबा के पास पहुंचे और रोने लगे। नंद बाबा ने जब कारण जाना, तो उन्होंने इसके पीछे की वजह बताई। उन्होंने बताया कि इंद्र हम सब के देवता हैं, बादल और वर्षा उनके ही रूप हैं। जब हम उनकी पूजा करते हैं और कई प्रकार के पकवानों का भोग उन्हें लगाते हैं तो वे प्रसन्न होते हैं।

वे प्रसन्न होकर वर्षा करते हैं, जिससे यह धरती हरी—भरी हो जाती है। फसलें लहलहाती हैं। इस पर कान्हा ने कहा कि नंद बाबा जीव का जन्म कर्म से होता है, जो कर्म करते हैं ईश्वर उन्हीं को फल भी देते हैं। हम सब के देवता तो गिरिराज गोवर्धन नाथ हैं, हमें तो उनकी पूजा करनी चाहिए।

इस पर केशव ने नंद बाबा से कहा कि अगर हम गोवर्धन की पूजा करेंगे, तो वह प्रसन्न होंगे और वे इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा भी करेंगे। कान्हा की बात से सहमत होकर सभी ब्रजवासियों ने गोवर्धन जी की पूजा की। जब इंद्र को इस बात की सूचना मिली, तो वह नाराज हो गए।

फलस्वरूप उन्होंने सात दिनों तक भारी वर्षा की, जिससे ब्रजवासियों की संकट बढ़ने लगी। इस पर श्रीकृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपने नख पर उठा लिया, जिससे समस्त ब्रजवासी गोवर्धन जी की शरण में आग गए।

उनको इंद्र के प्रकोप से राहत मिली और इंद्र का घमंड में चूर हो गया। उन्होंने इसके लिए श्रीकृष्ण और ब्रजवासियों से क्षमा भी मांगी। तभी से अन्नकूट या गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होता है। इस दिन वेदों में इंद्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं की पूजा का विधान है। इस दिन महिलाएं गोवर्धन की पूजा करके सुख और समृद्धि की कामना करती हैं।

Leave a Reply

Back to top button