मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन; ‘पद्मश्री’ से सम्मानित गजल सम्राट ने भोपाल में ली अंतिम सांस

मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन; ‘पद्मश्री’ से सम्मानित गजल सम्राट ने भोपाल में ली अंतिम सांस

भोपाल/नई दिल्ली: उर्दू अदब और आधुनिक गजल के सबसे चमकदार सितारे डॉ. बशीर बद्र (Dr. Bashir Badr) ने 91 वर्ष की उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। बशीर बद्र को गज़ल विधा में ठेठ, सरल, आम बोलचाल के और बेहद रूमानी शब्दों को पिरोने के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

उन्होंने उर्दू शायरी को महलों और भारी-भरकम, दुरूह शब्दों के दायरे से बाहर निकालकर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया। साहित्य के क्षेत्र में उनके इसी ऐतिहासिक और बेमिसाल योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा था। जीवन के अंतिम दौर में वे डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) के कारण अपनी याददाश्त खो चुके थे, लेकिन उनकी पत्नी अंत तक उन्हें उनकी ही लिखी कविताएँ और शेर सुनाकर उनकी यादों को महकाए रखती थीं।

 AMU से शुरू हुआ सफर और मेरठ का वो गहरा जख्म

15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का शैक्षणिक सफर बेहद शानदार रहा:

 जब शिमला समझौते (1972) में गूंजा बद्र साहब का शेर

बशीर बद्र की कलम में वो जादुई ताकत थी जो दो मुल्कों के बीच की कड़वाहट और फासलों को कम करने का माद्दा रखती थी। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द और दोनों देशों के रिश्तों पर उन्होंने जो कुछ भी लिखा, वो आज इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

उनकी इस प्रासंगिकता का सबसे बड़ा उदाहरण साल 1972 के ऐतिहासिक ‘शिमला समझौते’ के दौरान देखने को मिला था। तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो का स्वागत करते हुए कूटनीति के गलियारों में बशीर बद्र का ही एक मशहूर शेर सुनाया था, जिसने दोनों देशों के बीच संवाद और तल्खी को कम करने की एक नई राह खोली थी।मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन; ‘पद्मश्री’ से सम्मानित गजल सम्राट ने भोपाल में ली अंतिम सांस

 बशीर बद्र साहब के कुछ ऐसे शेर जो अमर हो गए:

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।”

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”

भले ही बद्र साहब आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन महफिलों में गूंजती उनकी गज़लें, उनका सादा मिजाज और उनके कालजयी शेर आने वाली कई पीढ़ियों तक दिलों को छूते रहेंगे।

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