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Exclusive ‘राज़’ दबाए बैठे हैं PK, महत्वाकांक्षाओं के कारण खतरे में पड़ा सियासी करियर

न्‍यूज डेस्‍क। चुनावी रणनीतिकार और राजनीतिज्ञ प्रशांत किशोर ने जितनी तेजी से सियासत का रास्ता तय किया उतनी ही तेजी से उनका सियासी करियर का ग्राफ भी गिर रहा है.

राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव की किताब के जरिए जनता दल यूनाइटेड (JDU) के उपाध्‍यक्ष प्रशांत किशोर (PK) पर उठा विवाद बढ़ता जा रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए शानदार चुनावी अभियान की जिम्मेदारी संभालने से लेकर नीतीश कुमार की पार्टी के डिप्टी बनने वाले पीके का जादू अब कम होता जा रहा है.

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चुनावी रणनीतिकार और राजनीतिज्ञ प्रशांत किशोर ने जितनी तेजी से सियासत का रास्ता तय किया उतनी ही तेजी से उनका सियासी करियर का ग्राफ भी गिर रहा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जिस तरह से पीके इतने कम वक्त में विवादों में फंसते जा रहे हैं, तमाम नेता भी उनसे दूरी बनाए रखना बेहतर समझ रहे हैं. ऐसे में पीके का राजनीतिक करियर खतरे में है.

प्रशांत किशोर को लेकर नया विवाद लालू यादव की किताब से सामने आया है. जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार के खास रहे प्रशांत किशोर को लेकर लालू प्रसाद यादव ने अपनी किताब Gopalganj to Raisina: My Political Journey में लिखा है कि नीतीश कुमार ने उनके माध्‍यम से महागठबंधन में फिर शामिल होने का प्रस्‍ताव भेजा था, जिसे उन्‍होंने नहीं माना. नीतीश कुमार का ये प्रस्‍ताव उनके महागठबंधन से नाता तोड़कर राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होकर नई सरकार बनाने के छह महीने के अंदर आया था. लालू की किताब में दर्ज इस बात को प्रशांत किशोर के साथ-साथ जेडीयू ने भी बेबुनियाद बताया है. लेकिन, राबड़ी देवी के खुलासे के बाद मामला और भी विवादित हो गया.

प्रशांत किशोर (PK) पहली बार 2012 में चर्चा में आए. इस साल नरेंद्र मोदी तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री चुने गए थे. मोदी की इस जीत की रूपरेखा प्रशांत किशोर ने ही खींची थी. पीके की असली पहचान साल 2014 के लोकसभा चुनावों से बनी. इस चुनाव में उन्होंने बीजेपी के लिए काम किया. आम चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत के लिए नरेंद्र मोदी, अमित शाह के बाद प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति को श्रेय दिया गया.

कहा जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के चुनाव प्रचार के दो अहम अभियान, ‘चाय पर चर्चा’ और ‘थ्री-डी नरेंद्र मोदी’ के पीछे प्रशांत किशोर का ही दिमाग था. ये दोनों अभियान काफी सफल रहे और बीजेपी सत्ता तक पहुंची.

बीजेपी के एक शीर्ष नेता बताते हैं, ‘2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत के बाद चुनावी रणनीतिकार पीएमओ के सामांतर एक विभाग बनाना चाह रहे थे. लेकिन, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इसे सिरे से खारिज कर दिया.’ बीजेपी नेता की मानें, तो इसके बाद पीके दूसरे कामों में जुट गए. इसी बीच बिहार के सीएम नीतीश कुमार से उनका संपर्क हुआ. फिर वह जेडीयू में नया जोश भरने में लग गए.

पीके 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के लिए रणनीति तैयार करते हुए नीतीश कुमार के और करीब आ गए. ये आरजेडी चीफ लालू प्रसाद यादव और जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार के साथ अल्पकालिक गठबंधन था. बाद में कांग्रेस भी इसमें शामिल हो गई. कांग्रेस ने एनडीए को बरगलाने का काम किया और बिहार में बीजेपी की एंट्री को रोक दिया.

महागठबंधन की सरकार बनने के बाद पीके ने कैबिनेट के गठन करने और पार्टी के दो नेताओं के बीच समन्वय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बिना किसी पोर्टफोलियो के उन्हें कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया. हालांकि, उनका कार्यकाल लंबे समय तक नहीं चला. यहां से वह एक कंसल्टेंसी फर्म चलाने चले गए. 2017 में उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए उन्होंने फिर से वापसी की.

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दुर्भाग्य से, इस बार पीके का तिलिस्म नहीं चला. सपा-कांग्रेस का गठबंधन फेल रहा और यूपी में बीजेपी को सबसे अधिक सीटें मिलीं. इस हार के बाद पीके कुछ समय के लिए गुमनामी में चले गए. नीतीश कुमार ने जब उन्हें जेडीयू का उपाध्यक्ष बनाया तो फिर से वह सुर्खियों में आ गए. नीतीश ने पीके को युवाओं को आकर्षित करके पार्टी के आधार का विस्तार करने की जिम्मेदारी दी गई थी.

जेडीयू के सूत्रों ने बताया कि किशोर एक से अधिक विभागों का प्रबंधन करना चाहते थे. लेकिन, ललन सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह, विजेंद्र यादव और आरएसपी सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ उनकी नहीं बन रही थी.

इसी बीच पीके पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनावों को प्रभावित करने का आरोप लगाया. जेडीयू के एक सूत्र बताते हैं कि पीके इसके बाद थोड़ा अलग-थलग रहने लगे थे. उनके बयान उनकी बातें पार्टी से इतर जाकर होती थी. पीके ने एक इंटरव्यू में खुलासा करते हुए कहा कि महागठबंधन को लेकर नीतीश कुमार के दिए गए फॉर्मूले से वह सहमत नहीं थे. लिहाजा उन्होंने 2017 में एनडीए में फिर से वापसी करना सही समझा.’

इसके बाद बिहार की राजनीति में बड़ा उथल-पुथल हुआ. भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. ऐसा भी कहा जाता है कि जेडीयू और महागठबंधन से अलग होने के बाद भी पीके नीतीश कुमार के संपर्क में थे और उनके करीबी बने हुए थे. लालू प्रसाद यादव ने अपनी किताब के एक चैप्टर में इसका जिक्र भी किया है. हालांकि, लालू ने जो भी दावे किए हैं, उसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है.

लालू ने अपनी किताब में प्रशांत किशोर को लेकर बड़े-बड़े दावे किए. कई आरोप लगाए, लेकिन पीके ने चुप्पी साध रखी है. वो कुछ नहीं बोल रहे. हालांकि, पीके ने बस इतना कहा कि अगर वो ‘राज’ खोल देंगे, तो लालू शर्मिंदा हो जाएंगे. शुक्रवार को लालू की पत्नी और बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी ने भी पीके को लेकर बड़े खुलासे किए. राबड़ी ने साफ कहा कि उन्होंने ही पीके को घर से निकाला था, क्योंकि वो नीतीश कुमार को सीएम बनाने की बात कर रहे थे. पीके इस पर भी कुछ कहने से बच रहे हैं.

ऐसे में राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पीके पार्टी लाइन से इतर जाकर काम कर रहे हैं और जेडीयू-आरजेडी, नीतीश कुमार, लालू यादव समेत कई लोगों और पार्टियों के ‘राज’ सीने में छिपाए बैठे हैं. कुछ नेता पीके से डरे भी हैं कि कहीं उनका राज़ न फाश हो जाए. ऐसे में वो पीके से दूरी बनाए रख रहे हैं और ऐसे में पीके का राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ गया है.

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