
नई दिल्ली। कागजों पर चांद के पार जाने की कल्पनाओं के बीच भारतीय वैज्ञानिकों ने असल में चांद के पार जाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसरो के बाहुबली रॉकेट के कंधे पर सवार चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव के उस हिस्से पर कदम रखेगा, जहां अब तक किसी देश का यान नहीं पहुंचा है।
छह सितंबर को रचे जाने वाले उस इतिहास का गवाह बनने के रास्ते पर कदम रख दिया गया है। रविवार सुबह छह बजकर 51 मिनट पर चंद्रयान-2 की लांचिंग की उलटी गिनती शुरू हुई। 20 घंटे के काउंटडाउन के बाद सोमवार की अलसुबह दो बजकर 51 मिनट पर इसकी लांचिंग का समय निर्धारित किया गया। लांचिंग के बाद 54वें दिन चंद्रयान-2 चांद की सतह पर कदम रखेगा।
कैमोर की मेघा “चंद्रयान 2” अभियान का अहम हिस्सा, पूरा प्रदेश गौरवान्वित, करेंगी डेटा एनालिसिस
https://yashbharat.com/archives/43932
ऐसा करते ही अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा ऐसा देश बन जाएगा, जिसने चांद की सतह पर यान उतारा है। 2008 में भारत ने चंद्रयान-1 को लांच किया था। यह एक ऑर्बिटर अभियान था। ऑर्बिटर ने 10 महीने तक चांद का चक्कर लगाया था। चांद पर पानी का पता लगाने का श्रेय भारत के इसी अभियान को जाता है।
इसरो की स्थापना के बाद से यह उसका अब तक का सबसे मुश्किल अभियान है। सफर के आखिरी दिन जिस वक्त रोवर समेत यान का लैंडर चांद की सतह पर उतरेगा, वह वक्त भारतीय वैज्ञानिकों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं होगा। खुद इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने इसे सबसे मुश्किल 15 मिनट कहा है। इसकी सफलता के साथ ही भारत इस क्षेत्र में एक नई छलांग लगा लेगा। इस अभियान की महत्ता को इससे भी समझा जा सकता है कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी अपना एक पेलोड इसके साथ लगाया है।
मुख्य बिंदु
- 20 घंटे के काउंटडाउन और 54 दिन के सफर में रचा जाएगा इतिहास
-
6 बजकर 51 मिनट पर रविवार सुबह शुरू हुआ काउंटडाउन
-
2 बजकर 51 मिनट पर सोमवार की सुबह लांचिंग का निर्धारित समय
-
6 सितंबर को चांद की सतह पर लैंडर के उतरने का अनुमान
ऐसा होगा चांद तक का सफर
चंद्रयान-2 के चांद तक पहुंचने में 54 दिन लगेंगे। इसके 6 या 7 सितंबर को चांद की सतह पर उतरने का अनुमान है। 16 मिनट की उड़ान के बाद रॉकेट इस यान को पृथ्वी की बाहरी कक्षा में पहुंचा देगा। इसके बाद 16 दिनों तक यह धरती की परिक्रमा करते हुए चांद की ओर बढ़ेगा। इस दौरान इसकी रफ्तार 10 किलोमीटर/प्रति सेकंड होगी। 16 दिन बाद चंद्रयान-2 से रॉकेट अलग हो जाएगा। फिर इसे चांद की कक्षा तक पहुंचाया जाएगा। चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद यह चंद्रमा का चक्कर लगाने लगेगा। यह चांद का चक्कर लगाते हुए उसकी सतह की ओर बढ़ेगा। चांद की सतह पर पहुंचने के बाद लैंडर और रोवर 14 दिनों तक जानकारियां जुटाते रहेंगे।
चंद्रयान-2 के हैं तीन हिस्से
चंद्रयान-2 के तीन हिस्से हैं ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर। अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के सम्मान में लैंडर का नाम विक्रम रखा गया है। वहीं रोवर का नाम प्रज्ञान है, जो संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान। चांद की कक्षा में पहुंचने के चार दिन बाद लैंडर-रोवर अपने ऑर्बिटर से अलग हो जाएंगे। विक्रम छह सितंबर को चांद के दक्षिणी ध्रुव के नजदीक उतरेगा और वहां तीन वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देगा। चांद पर उतरने के बाद रोवर उससे अलग होकर 14 दिन तक अन्य प्रयोगों को अंजाम देगा। चांद के हिसाब से यह अवधि एक दिन की बनेगी। वहीं ऑर्बिटर सालभर चांद की परिक्रमा करते हुए आठ प्रयोग करेगा। इस पूरे अभियान में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी एक प्रयोग को अंजाम देगी।
दक्षिणी ध्रुव है कुछ विशेष
इस अभियान के लिए चांद के दक्षिणी ध्रुव को चुनना भी सोचा-समझा फैसला है। इसरो का कहना है कि उत्तरी धु्रव के मुकाबले यह हिस्सा छाया में रहता है। यहां पर्याप्त पानी होने की उम्मीद है। इस हिस्से में हमारी सौर व्यवस्था के शुरुआत दिनों के प्रमाण मिलने का भी अनुमान है। लैंडर विक्रम यहां दो क्रेटरों (अंतरिक्षीय पिंडों के टकराने से बने विशाल गड्ढे) के बीच के ऊंचे मैदान पर उतरेगा। उतरने की सुरक्षित और सटीक जगह लैंडर पर लगे कैमरे से मिलने वाली तस्वीरों के आधार पर चुनी जाएगी।
दुनिया की टिकी निगाहें
चंद्रयान-2 की सफलता पर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। चंद्रयान-1 ने दुनिया को बताया था कि चांद पर पानी है। अब उसी सफलता को आगे बढ़ाते हुए चंद्रयान-2 चांद पर पानी की मौजूदगी से जुड़े कई ठोस नतीजे देगा। यह अभियान चांद पर विभिन्न अणुओं में पानी की उपस्थिति का अध्ययन करेगा।
इससे चांद की सतह नक्शा तैयार करने में मदद मिलेगी, जो भविष्य में अन्य अभियानों के लिए सहायक होगा। चांद की मिट्टी कौन-कौन से खनिज हैं और किस मात्रा में हैं, चंद्रयान-2 इससे जुड़े कई राज खोलेगा। उम्मीद यह भी है कि चांद के जिस हिस्से की पड़ताल का जिम्मा चंद्रयान-2 को मिला है, वह हमारी सौर व्यवस्था को समझने और पृथ्वी के विकासक्रम को जानने में भी मददगार हो सकता है।
दुनियाभर के अखबारों और पत्रिकाओं ने रखी अपनी राय
- द गार्जियन ने चांद पर मानव कदम प़़डने के 50 साल बाद फिर चांद की ओर अंतरिक्ष एजेंसियों के झुकाव का विश्लेषण किया है। अभी कुछ महीने पहले ही चीन ने भी चांद पर अपना यान उतारा है।
-
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसी विषय पर लिखा है। उसका कहना है कि भारत के लिए यह चंद्र अभियान टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उसकी प्रगति का प्रतीक है। चीन अपने अभियान से खुद को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। वहीं, अमेरिका और नासा के लिए मंगल पर जाने के रास्ते में चांद एक प़़डाव की तरह हो गया है।
-
वाशिंगटन पोस्ट ने इस अभियान को अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की ब़़ढती महत्वाकांक्षा का प्रतीक बताया है। वाशिंगटन पोस्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भी प्रशंसा की है। इसने लिखा, ‘भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रमों की शुरुआत 1960 के करीब ही हो गई थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इसे नई ख्याति मिली है। मोदी ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ब़़ढते कद और मजबूत रक्षा क्षमताओं से जोड़कर प्रोत्साहित किया है।’
50 साल पहले पहुंचा था मानव
उल्लेखनीय है कि ठीक 50 साल पहले 16 जुलाई, 1969 को अमेरिका ने चांद पर मानव भेजने के लिए अपना अपोलो-11 यान रवाना किया था। पांच दिन बाद यानी 21 जुलाई को अंतरिक्षयात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर पहला कदम रखा था। 19 मिनट बाद उनके साथी बज एल्डि्रन ने चांद पर कदम रखा था।








