ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट अंतिम सबूत नहीं: पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला; अब शराबबंदी और ड्रिंक एंड ड्राइव मामलों में मेडिकल जांच होगी जरूरी
बिहार के शराबबंदी कानून के बीच पटना हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ किया है कि पुलिस या प्रशासन सिर्फ ब्रेथ एनालाइजर मशीन (Breath Analyzer Machine) की डिजिटल रीडिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को शराब पीने का दोषी नहीं मान सकता. शराब के सेवन की कानूनी और पुख्ता पुष्टि के लिए अब ब्लड (रक्त) या यूरिन (मूत्र) टेस्ट जैसी वैज्ञानिक व मेडिकल जांच अनिवार्य होगी.
यह फैसला मोतिहारी के एक पुलिसकर्मी की बर्खास्तगी के मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसे केवल मशीन की रिपोर्ट पर नौकरी से निकाल दिया गया था, जबकि उसका दावा था कि उसने दवा (कफ सिरप आदि) ली थी. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब जांच की पूरी प्रक्रिया बदलने जा रही है.
क्या है ब्रेथ एनालाइजर और कोर्ट को इस पर संदेह क्यों है?
1. यह कैसे काम करता है?
ब्रेथ एनालाइजर एक छोटा, पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है. जब कोई संदिग्ध व्यक्ति इसमें फूंक मारता है, तो फेफड़ों से निकलने वाली सांस में मौजूद एथेनॉल (अल्कोहल) के कणों को मशीन का सेंसर मापता है. इसके बाद यह डिजिटल स्क्रीन पर ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन (BAC) की रीडिंग दिखाता है. तुरंत रिजल्ट देने के कारण पुलिस ऑन-स्पॉट चेकिंग के लिए इसका इस्तेमाल करती है.
2. कोर्ट ने इसे अंतिम सबूत मानने से क्यों इनकार किया?
पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार, ब्रेथ एनालाइजर की रिपोर्ट 100% सटीक नहीं होती.
- कई बार अल्कोहल युक्त कफ सिरप, माउथवॉश या कुछ विशिष्ट दवाइयों के सेवन से भी मशीन में अल्कोहल की पुष्टि हो जाती है.
- यदि मशीन का समय पर कैलिब्रेशन (सर्विसिंग/सटीकता की जांच) न किया गया हो, तो भी रीडिंग गलत आ सकती है.
- केवल एक मशीन के आंकड़े पर किसी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है.
नई व्यवस्था: अब अदालत में कौन सी रिपोर्ट होगी मान्य?
हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब पुलिस की कार्रवाई का तरीका पूरी तरह वैज्ञानिक और बहुस्तरीय (Multi-layered) होगा:
चरण 1: मौके पर ब्रेथ एनालाइजर से शुरुआती स्क्रीनिंग
चरण 2: संदिग्ध पाए जाने पर सरकारी अस्पताल में ब्लड/यूरिन टेस्ट
चरण 3: डॉक्टर द्वारा शारीरिक व मानसिक स्थिति की क्लिनिकल जांच
चरण 4: मौके का पंचनामा और व्यवहार की वीडियो रिकॉर्डिंग
प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence): लैब से आने वाली ब्लड या यूरिन की रासायनिक जांच रिपोर्ट ही अदालत में सबसे मजबूत कानूनी सबूत मानी जाएगी.
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डॉक्टर की क्लिनिकल रिपोर्ट: डॉक्टर यह दर्ज करेंगे कि क्या व्यक्ति की बोली लड़खड़ा रही है, चाल असामान्य है, आंखों की पुतलियां फैली हैं या वह मानसिक रूप से असंतुलित है.
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वीडियो और पंचनामा: कार्रवाई को पारदर्शी बनाने के लिए संदिग्ध के व्यवहार की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी और स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में मौके का पंचनामा तैयार होगा. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि ब्रेथ एनालाइजर का इस्तेमाल बंद हो जाएगा. यह पुलिस के लिए शुरुआती जांच (Screening Tool) का काम करता रहेगा, लेकिन सजा दिलाने के लिए मेडिकल रिपोर्ट ही निर्णायक होगी.
