AISA नेता नेहा बोरा को बड़ा झटका: दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका, भरना होगा ₹10,000 का ‘पीस बॉन्ड’
नई दिल्ली: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेता नेहा बोरा को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा है। हाई कोर्ट ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट (SEM Court) द्वारा जारी नोटिस को चुनौती देने वाली बोरा की याचिका को खारिज कर दिया है। अब उन्हें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का पीस बॉन्ड (Peace Bond) भरना होगा।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा, “मैं इस स्तर पर इस रिट याचिका को खारिज कर रहा हूं।” हालांकि, अदालत ने मजिस्ट्रेट को स्पष्ट निर्देश दिया है कि कार्रवाई से संबंधित सभी प्रासंगिक दस्तावेज और सामग्री नेहा बोरा को उपलब्ध कराई जाए।
क्या है पूरा मामला?
16 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने नेहा बोरा को एहतियातन हिरासत में लिया था और अगले दिन रिहा कर दिया था। इसके बाद SEM कोर्ट ने नोटिस जारी कर बोरा को 10 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरने और जमानती पेश करने का आदेश दिया। नेहा बोरा ने इसे बेवजह की कार्रवाई बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया।
कानून की नजर में: क्या होता है ‘पीस बॉन्ड’ और क्या हैं इसके नियम?
किस कानून के तहत?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 126 के तहत प्रशासन को पीस बॉन्ड भरवाने का अधिकार है।
सजा नहीं, बचाव का तरीका:
पीस बॉन्ड किसी अपराध की सजा नहीं है, बल्कि सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लिया जाने वाला एक प्रिवेंटिव (निवारक) कदम है। इसकी समय-सीमा अधिकतम 1 साल हो सकती है।
बॉन्ड पर दस्तखत न करने का अंजाम:
BNSS की धारा 136(3) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पीस बॉन्ड भरने या जमानत राशि देने से मना करता है, तो उसे न्यायिक हिरासत में भेजा जा सकता है।
शर्तों का उल्लंघन:
धारा 141(1)(b) के तहत, शर्तों का उल्लंघन करने पर मजिस्ट्रेट व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर बॉन्ड की बची हुई अवधि तक के लिए जेल भेज सकता है।
कौन होते हैं स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM)?
सामान्य मजिस्ट्रेट न्यायपालिका (Judiciary) का हिस्सा होते हैं, जबकि SEM प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन कार्य करते हैं। दिल्ली में पुलिस के असिस्टेंट कमिश्नर (ACP) रैंक के अधिकारियों को SEM की शक्तियां प्राप्त हैं।
उल्लेखनीय है कि साल 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने SEM शक्तियों के अत्यधिक इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इससे अक्सर समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को भारी जमानत राशि न जुटा पाने के कारण जेलों में रहना पड़ता है।













