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जिलेभर में हर्षोउल्लास के साथ मनाई जा रही बकरीद, मस्जिदों व ईदगाह में अता हुई ईद की नमाज

कटनी। आज जिले भर में ईद-उल-अजहा (बकरीद) का त्योहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार ईद-उल-जुहा हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। बकरीद को ईद उल अजहा, ईद उल जुहा, बकरा ईद अथवा ईद उल बकरा के नाम से भी जाना जाता है।

बकरीद के मौके पर मुस्लिम धर्म में नमाज पढऩे के साथ साथ जानवरों की कुर्बानी भी दी जाती है। इस्लाम के अनुसार मुस्लिम धर्म के लोग अल्लाह की रजा के लिए कुर्बानी करते हैं।

इन जगहों पर हुई ईद की नमाज

शहर व उपनगरीय क्षेत्रों सहित ग्रामीण अंचलों पर स्थित मस्जिदों व ईदगाह में बकरीद की नमात पढ़ी गई। शहर में आदर्श कालोनी स्थित ईदगाह, ईश्वरी पुरा वार्ड स्थित शहर जामा मस्जिद, मिशन चौक स्थित नगीना मस्जिद, आजाद चौक स्थित नूरी(छोटी) मस्जिद, अल्फर्ट गंज स्थित वक्फ मस्जिद, अहमद नगर कुठला स्थित इस्हाकिया मस्जिद, झर्राटिकुरिया स्थित अबू जर गफ्फारी मस्जिद, बरगवां स्थित एक मिनारा(अजीमिया) व गौसिया मस्जिद, मंगलनगर मस्जिद, आयुध निर्माणी स्थित वक्फ मस्जिद, एनकेजे में रजानगर स्थित जमा मस्जिद, नूरलबशर मस्जिद, रोशननगर स्थित मदीना मस्जिद, अमीरगंज मस्जिद, खिरहनी फाटक मस्जिद, दुर्गा चौक खिरहनी मस्जिद व लमतरा स्थित हुसैनी मस्जिद में ईद की नमाज पढ़ी गई। इसके अलावा जिले के ग्रामीण अंचलों में स्थित मस्जिद व ईदगाह में ईद की नजाम अता कराई गई।

इस्लाम में कुर्बानी का बड़ा महत्व

इस्लाम में कुर्बानी का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। कुरान के अनुसार कहा जाता है कि एक बार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने हजरत इब्राहिम को हुक्म दिया कि वह अपनी सबसे प्यारी चीज को उन्हें कुर्बान कर दें। हजरत इब्राहिम को उनके बेटे हजरत ईस्माइल सबसे ज्यादा प्यारे थे। अल्लाह के हुक्म के बाद हजरत इब्राहिम ने ये बात अपने बेटे हजरत ईस्माइल को बताई। गौरतलब है कि हजरत इब्राहिम को 80 साल की उम्र में औलाद नसीब हुई थी। जिसके बाद उनके लिए अपने बेटे की कुर्बानी देना बेहद मुश्किल काम था लेकिन हजरत इब्राहिम ने अल्लाह के हुक्म और बेटे की मुहब्बत में से अल्लाह के हुक्म को चुनते हुए बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया। हजरत इब्राहिम ने अल्लाह का नाम लेते हुए अपने बेटे के गले पर छूरी चला दी लेकिन जब उन्होंने अपनी आंख खोली तो देखा कि उनका बेटा बगल में जिंदा खड़ा है और उसकी जगह बकरे जैसी शक्ल का जानवर कटा हुआ लेटा हुआ है। जिसके बाद अल्लाह की राह में कुर्बानी देने की शुरूआत हुई।

इसलिए दी जाती है कुर्बानी

ईद-उल-अजहा हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। इस दिन इस्लाम धर्म के लोग किसी जानवर की कुर्बानी देते हैं। इस्लाम में सिर्फ हलाल के तरीके से कमाए हुए पैसों से ही कुर्बानी जायज मानी जाती है। कुर्बानी का गोश्त अकेले अपने परिवार के लिए नहीं रख सकता है, इसके तीन हिस्से किए जाते हैं। पहला हिस्सा गरीबों के लिए होता है, दूसरा हिस्सा दोस्त और रिश्तेदारों के लिए और तीसरा हिस्सा अपने घर के लिए होता है।

इतने लोग मिलकर दे सकते हैं कुर्बानी

कुर्बानी के लिए जानवरों चुनते समय पर अलग-अलग हिस्से हैं। जहां बड़े जानवर(भैंस) पर सात हिस्से होते हैं तो वहीं बकरे जैसे छोटे जानवरों पर महज एक हिस्सा होता है। मतलब साफ है कि अगर कोई शख्स भैंस या ऊंट की कुर्बानी कराता है तो उसमें सात लोगों को शामिल किया जा सकता है। वहीं बकरे की कराता है तो वो सिर्फ एक शख्स के नाम पर होता है।

सेहतमंद जानवर की कुर्बानी ही जायज

इस्लाम में ऐसे जानवरों की कुर्बानी ही जायज मानी जाती है जो जानवर सेहतमंद होते हैं। अगर जानवर को किसी भी तरह की कोई बीमारी या तकलीफ हो तो अल्लाह ऐसे जानवर की कुर्बानी से राजी नहीं होता है।

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