जबलपुर। संस्कारधानी वैसे तो देश की आजादी के पहले से ही राजनीति का केंद्र हमेशा से रहा है। खास कांग्रेस की राजनीति में जबलपुर का उल्लेखनीय स्थान था।
जबलपुर के तिलवाराघाट में हुए कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन में नेताजी को पूरी बुलंदी के साथ अध्यक्ष चुना गया था। महात्मा गांधी की ओर से उम्मीदवार रहे, पट्टाभि सीतारमैया को 203 मतों से करारी हार मिली थी। यह बात अलग है कि तत्कालीन शीर्ष नेताओं के विरोध के चलते नेताजी ने चार महीने बाद ही यह पद त्याग दिया था।
इतिहास अपने को दोहराता है
यह बात भले ही आज की पीढ़ी के लिए कोई खास मायने न रखती हो लेकिन कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है। पिछले करीब 2 वर्ष से एक बार फिर जाबालि ऋषि की तपोभूमि चर्चाओं में है। कारण सभी को ज्ञात है। विधानसभा चुनाव में महाकौशल की राजनीति में हमेशा सक्रिय रहने वाले सांसद राकेश सिंह को प्रदेश भाजपा का चीफ पद देकर राजनीति में नया अध्याय शुरू किया तो कांग्रेस ने महाकौशल के कद्दावर नेता कमलनाथ को पीसीसी चीफ बना कर मामला बराबरी पर ला दिया।
विधानसभा चुनाव में महाकौशल विशेष तौर पर जबलपुर ने खास रोमांच के साथ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। फिर कुछ महीनों बाद लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिसाब बराबर कर दिया, तब भी जबलपुर चर्चाओं में रहा ।
अब जबकि राजनीतिक गलियारों में मद्धम मद्धम शांति है तो भाजपा ने जैसे ही जगत प्रकाश नड्डा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया अचानक जबलपुर फिर चर्चित होने लगा। इस बार चर्चा का कारण यह है कि श्री नड्डा जबलपुर में संघ और भाजपा के लिए समर्पित बैनर्जी परिवार के दामाद हैं। बता दें कि पूर्व सांसद जयश्री बनर्जी की पुत्री मल्लिका से जगत प्रकाश नड्डा का विवाह हुआ मल्लिका स्वयं भी अभाविप की राजनीति में सक्रिय रहीं हैं।
संयोग ही है
बहरहाल अब इसे संयोग ही कहें कि भाजपा के नजरिए से जबलपुर काफी महत्वपूर्ण हो गया। हो भी क्यों न, आखिर यहां से राकेश सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हैं तो दामाद अर्थात जेपी नड्डा bjp के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।
तय है कि बेटे और दामाद के देश के प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया का सम्बंध जबलपुर से होने के साथ ही संस्कारधानी एक बार फिर से सुर्खियों में है । माना जा रहा है कि राकेश सिंह ही फिर से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने की दौड़ में आगे हैं, लिहाजा कोई बहुत बड़ा फेरबदल नही हुआ तो जबलपुर से ही भाजपा प्रदेश अध्य्क्ष रहेगा।
कांग्रेस भी कम नहीं, इन शख्सियत का भी जबलपुर से नाता
इधर बात कांग्रेस की करें तो प्रदेश के मंत्रिमंडल में 2 कैबिनेट मंत्री लखन घनघोरिया तथा तरूण भनोट शामिल हैं खास बात यह है कि इसमे सरकार में सबसे अहम वित्तमंत्री का पद जबलपुर के ही पास है। सिर्फ यही नहीं कांग्रेस के लीगल सेल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद के रूप में विवेक तनखा जैसी शख्सियत भी जबलपुर से हैं। तो वहीं महाकौशल की राजनीति में युवा नेतृत्व के रूप में वर्तमान विजयराघवगढ़ विधायक और पूर्व मंत्री चर्चित संजय पाठक का जबलपुर ननिहाल है।
इतना ही नहीं खजुराहो सांसद विष्णुदत्त शर्मा की ससुराल भी जबलपुर ही है। देश की वर्तमान कुछ अन्य शख्सियत की बात करें तो राष्ट्रीय नेता और पूर्व एनडीए संयोजक शरद यादव की कर्म भूमि जबलपुर ही रही।
उत्तर पूर्व में भाजपा की जमीन तैयार करने में भूमिका निभाने वाले दमोह सांसद प्रहलाद पटैल का जबलपुर से छात्र राजनीति से अब तक का राजनीतिक सफर किसी पहचान का मोहताज नहीं।
भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष अभिलाष पांडे भी जबलपुर के हैं। कुलमिलाकर प्रदेश ही नहीं देश की राजनीति में जबलपुर एक ऐसा शहर है जिसकी चर्चा दोनो प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण है।
