
कटनी। किसी भी धर्म के त्योहार और संस्कृति उसकीडी पहचान होते हैं। त्योहार उत्साह, उमंग व खुशियों का ही स्वरूप हैं। सभी धर्मों के कुछ विशेष त्योहार या पर्व होते हैं जिन्हें उस धर्म से संबंधित समुदाय के लोग मनाते हैं।
ऐसा ही पर्व है सिंधी समाज का ‘थदड़ी’। थदड़ी शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ होता है ठंडी, शीतल…।
रक्षाबंधन के आठवें दिन और हरछठ के दूसरे दिन इस पर्व को समूचा सिंधी समुदाय हर्षोल्लास से मनाता है।
जिसमें हरछठ के दिन विभिन्ना प्रकार के व्यंजन बनाए जाते है। तथा ब्राम्हणी के घर उन्ही व्यंजनों के साथ कथा सुनकर व्रत पूरा किया जाता है। आैर घर में सभी सउस्य बांसी खाना ही खाते है।
बासी भोजन खाने की परंपरा काफी पुरानी है। जो कि चेचक जैसी माहमारी को रोकने के लिए शुरू की गई। जो आज भी निरंतर इसी तरह निभाई जाती है।
दरअसल कोरोना काल में इस माहमारी को लेकर आज नई बस्ती सिंधी समाज की महिलाओं ने व्रत में कथा सुनने के बाद शाीतला माता की स्तुति कर मान्यमा मानी कि कोरोना जैसी माहमारी से पूरे देश व विश्व की रक्षा हो।
माँ का स्तुति गान कर उनके लिए कामना की । शीतल रहें व माता के प्रकोप से बचे रहें। इस दौरान ये पंक्तियाँ गाई ।
ठार माता ठार पहिंजे बच्चणन खे ठार
माता अगे भी ठारियो तई हाणे भी ठार…
दूसरे दिन सप्तमी को पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है एवं एक दिन पहले बनाया ठंडा खाना ही खाया जाता है।
इसके पहले परिवार के सभी सदस्य किसी नदी, नहर, कुएँ या बावड़ी पर इकट्ठे होते हैं वहाँ माँ शीतला देवी की विधिवत पूजा की जाती है।
इसके बाद बड़ों से आशीर्वाद लेकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। बदलते दौर में जहाँ शहरों में सीमित साधन व सीमित स्थान हो गए हैं। ऐसे में पूजा का स्वरूप भी बदल गया है।
इसका तात्पर्य यह है कि हे माता मेरे बच्चों को शीतलता देना। आपने पहले भी ऐसा किया है आगे भी ऐसा करना…।
इस दिन घर के बड़े बुजुर्ग सदस्यों द्वारा घर के सभी छोटे सदस्यों को भेंट स्वरूप कुछ न कुछ दिया जाता है जिसे खर्ची कहते हैं। थदड़ी पर्व के दिन बहन और बेटियों को खासतौर पर मायके बुलाकर इस त्योहार में शामिल किया जाता है।

इसके साथ ही उसके ससुराल में भी भाई या छोटे सदस्य द्वारा सभी व्यंजन और फल भेंट स्वरूप भेजे जाते हैं इसे ‘थदड़ी का ढि्ण’ कहा जाता है।

इस तरह सिंधी समाज द्वारा बनाए जाने वाले ‘थदड़ी पर्व’ के कुछ रोचक और विशिष्ट पहलुओं को प्रस्तुत किया है। परंपराएँ और आस्था अपनी जगह कायम रहती हैं बस समय-समय पर इसे मनाने का स्वरूप बदल जाता है। यह भी सच है कि त्योहार मनाने से हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं व सामाजिकता भी कायम रहती है।

हालाँकि आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि माता (चेचक) के इंजेक्शन बचपन में ही लग जाते हैं। परंतु दैवीय शक्ति से जुड़ा ‘थदड़ी पर्व’ हजारों साल बाद भी सिंधी समाज का प्रमुख त्योहार माना जाता है। इसे आज भी पारंपरिक तरीके से मिलजुल कर मनाया जाता है। आस्था के प्रतीक यह त्योहार समाज में अपनी विशिष्टता से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं और आगे भी कराते रहेंगे।








