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विधान सभा चुनाव : मुड़वारा में छोटे दल फिर खिलाएंगे गुल

कटनी। विधानसभा चुनाव को अब बमुश्किल 4 महीना ही बचे हैं। वैसे तो राजनीतिक समीकरण बनते बिगड़ते हैं तो इसका असर कुछ दिन क्या कुछ घण्टों में ही समझ मे आ जाता है, लेकिन कटनी जिले में वर्तमान परिदृश्य दो प्रमुख दलों तक सिमटा नजर आ रहा है, पर चुनाव तक ऐसा ही रहे यह कहना जल्दबाजी होगी।

खास कटनी मुड़वारा विधानसभा की ही बात करें तो यहां भले ही तीसरी ताकत के रूप में जनता दल यू, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी या फिर इस चुनाव से पनपी आम आदमी पार्टी भी आशान्वित नजर आ रही है।

कम से कम जीत न सही लेकिन हार जीत में यह दल महत्वपूर्ण भूमिका तो निभा ही सकते हैं। वैसे पिछले इतिहास पर गौर फरमाया जाए तो इन अन्य दलों ने कांग्रेस के ही वोट बैंक में सेंधमारी की है क्योंकि जब-जब तीसरे दल ने चुनाव में जोर लगाया तब तब फायदा बीजेपी को ही हुआ।

1992 से लेकर अब तक हुए पांच चुनाव में इसकी बानगी आसानी से नजर आ जाती है। 1992 के चुनाव में भाजपा कटनी मुड़वारा सीट पर पहली दफे जीती थी। उस समय कटनी में त्रिकोणीय संघर्ष को आज भी लोग याद करते हैं। तब जनता दल की तरफ से मोहन शुक्ला प्रत्याशी थे। श्री शुक्ला और जद ने पूरी ताकत से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत भाजपा के सुकीर्ति जैन की हुई।

इस वक्त करीब 15 हजार से अधिक वोट जनता दल ले गई थी। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ। इसके ठीक विपरीत 1998 के चुनाव में जनता दल ने निरंजन पंजवानी को मैदान में उतारा। तभी लगने लगा था कि नुकसान भाजपा को हो सकता है और हुआ भी वैसा। निरंजन महज 7 हजार वोट पर सिमटे तो जनता दल का वोट बैंक सीधा कांग्रेस की तरफ जाता दिखा।

भाजपा को वोट तो 1992 के चुनाव से अधिक मिले लेकिन जीत कांग्रेस के एपी सिंह के पास जाती दिखी। 2003 में यही मुकाबला फिर त्रिकोणीय बना। अबकी बार भाजपा ने अलका जैन पर दांव लगाया इस बार कांग्रेस से बागी हुए पूर्व विधायक सुनील मिश्रा ने जनता दल यू का दामन थाम कर ताल ठोंकी इस बार भी भाजपा को फायदा पहुंचा। 18 हजार से अधिक वोट सुनील मिश्रा ले गए लेकिन जीत भाजपा के खाते में जा पहुंची। इस बार कांग्रेस ने वही गलती की जो भाजपा ने की थी टिकट रिपीट की।

डा. एपी सिंह को रिपीट करने का खामियाजा यह हुआ कि कांग्रेस को करारी शिकस्त हासिल हुई। मतलब इस चुनाव में भी तीसरे प्रत्याशी को वोट ज्यादा मिले और कांग्रेस को नुकसान हुआ। अब बारी 2008 की थी इस बार भाजपा ने टिकट बदल का सभी को चौंकाया। अलका जैन की टिकट कटी तो राजू पोद्दार को मौका मिला। कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी घोषित होने के बाद से ही माहौल धीरे धीरे भाजपा के पक्ष में जाता दिखा। इस बार जनता दल तो ताकत से मैदान में नहीं दिखा लेकिन वर्तमान विधायक संदीप जायसवाल ने भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ ताल ठोंकते हुए निर्दलीय किस्मत आजमाई चूंकि वह निर्दलीय रूप से महापौर के चुनाव में सफल हो चुके थे लिहाजा उम्मीद थी कि विधायक भी बन सकते हैं, लेकिन जनता ने न सिर्फ निर्दलीय संदीप जायसवाल को नकार दिया वरन कांग्रेस को भी मजा चखाते हुए भाजपा को करीब 32 हजार वोट से जिता दिया।

मतलब साफ था कि निर्दलीय संदीप को मिले वोट कांग्रेस के लिये सेंंध थे। परिस्थितियां फिर बदलीं 2013 में भाजपा के ही खिलाफ लड़ने वाले संदीप इस बार भाजपा के ही साथ थे और पार्टी ने विश्वास जताते उन्हें टिकट भी आफर कर दी। इस बार मुकाबला सीधा-सीधा भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ कांग्रेस से फिरोज अहमद पर दांव न चला। वन टू वन फाइट में भाजपा ने अपने पिछले रिकार्ड को ध्वस्त करते हुए 40 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया।tavite

साफ है जब जब यहां त्रिकोणीय संघर्ष हुआ फायदा भाजपा ने ही उठाया। लेकिन इस सब में महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जब कांग्रेस ने टिकट रिपीट की तब उसे नुकसान हुआ और जब भाजपा ने टिकट रिपीट की उसे। देखना है इस बार पार्टी पिछले चुनावों को गौर करती है अथवा नहीं। वर्तमान में कांग्रेस और बसपा के गठबंधन के साथ आम आदमी पार्टी तथा जनता दल संयुक्त रूप से किसी को अपना प्रत्याशी उतार सकती है ऐसे में यह प्रत्याशी किसे नुकसान पहुंचायेगा यह भविष्य के गर्भ में छिपा है, लेकिन भाजपा को अपने वोट बैंक के खिसकने की ज्यादा चिंता नहीं है मुश्किल तो कांग्रेस में है।

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम

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