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चुनावी बुखार चढ़ाने बेअसर रहे नारे

चुनाव में खूब चला आरोप,प्रत्यारोप का दौर, बमबाजी और गोलियों की धमक, नारे रहे बेअसर

जबलपुर यभाप्र । एक समय था जब नारे किसी भी चुनाव में प्रत्याशी की वैतरणी पार लगाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाया करते थे। लेकिन इस बार नारों का दम दिखाई नही दिया। नारे ना तो जनता की जुबान पर चढ़ पाए और ना ही पार्टी की दशा दिशा तय कर पाए। नारे इस बार फिर भाजपा फिर शिवराज और सबकी यही पुकार परिवर्तन हो इस बार तक ही सिमटकर रह गए। नारों में स्थानीय मुद्दों के साथ जनता की छबि छुपी रहती है। लेकिन इस चुनाव में नारों ने कोई धमाल नही दिखाया। इनमें ना तो कोई नेता टारगेट हुआ और ना ही मुद्दें। भाजपा में एकमात्र नारा शिवराज को समर्पित रहा जबकि कांग्रेस में कोई ठोस अपील दिखाई नही दी। गरीबों का साथ कांग्रेस का नारा भी असरकारक साबित नही हुआ। हालांकि इन सबके बीच चुनावी नारों की जगह आपसी छींटाकशी,कार्यो पर हमलें सहित गोली और बमों की अवाज ज्यादा सुनाई दी।
ये रहे कांग्रेस के नारे
कांग्रेस के साथ वक्त है बदलाव का।
भाजपा का यही काम हड़पे जमीन करे दादागिरी सरेआम।
मामा ने रचा आंकड़ो का मायाजाल विज्ञापनों से परे प्रदेश का हाल।
घोषणावीर का देखो खेल कथनी करनी में नही मेल
विज्ञापनों से बाहर आओगे शिवराज बहुत पछताओगे।
वाह रे भाजपा तेरा व्यापम घोटाला मुन्ना भाईयो को डॉक्टर बनाया।
भाजपा के नारे
माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज।
नीयत भ्रष्ट न नीति साफ क्या चुनेगें इन्हें आप।
जुबां के पक्के होते तो नाम बदल देते।
पन्द्रह बरस बनवास के पन्द्रह बरस राज।
जहां जहां इनके पांव पड़े वहां बंटाधार।
कौन चाहिए महाराज या गरीब किसान का बेटा शिवराज
2013 में चुनावी मैदान में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चुनाव की कमान संभाली हुई थी कांग्रेस द्वारा गुना से सांसद सिंधिया को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में मैदान मे उतारा था लेकिन भाजपा ने इस निर्णय का बखूबी इस्तेमाल करते हुए नारा दिया था कि कौन चाहिए महाराज या गरीब किसान का बेटा शिवराज
इस नारे ने ऐसा असर दिखाया था कि जनता ने एक बार फिर सत्ता की चाबी भाजपा के हाथों में सौंप दी थी।

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