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कोर्ट तय नहीं करेगा कि शादी सही आदमी से हुई या नहीं

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नेशनल डेस्‍क। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केरल के चर्चित लव जिहाद मामले की सुनवाई के तहत कहा कि अदालत किसी भी व्यक्ति को उसके चुनाव के लिए सजा नहीं दे सकता है.yashbharat

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा कि यह कोर्ट का काम नहीं है कि वह एक वयस्क की किसी से शादी को लेकर चर्चा करे. कोर्ट ने कहा, “हम यह नहीं कह सकते कि यह शादी उसके हित में नहीं है और न ही हम यह तय कर सकते हैं कि यह सही विकल्प है या नहीं. हम इस आधार पर शादी को इस वजह से रद्द नहीं कर सकते हैं कि जिस व्यक्ति से उसने शादी की है वह सही व्यक्ति नहीं है.”

बता दें कि 25 वर्षीय हादिया के धर्म परिवर्तन के बाद एक मुस्लिम युवक से हुई शादी को केरल हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है. हाईकोर्ट ने इस शादी को लव जिहाद माना था.

हादिया के पिता की तरफ से पेश हुए वकील श्याम दीवान ने अपनी दलील में हाईकोर्ट के आदेश को सही बताया. इस पर कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया कि दो वयस्कों की आपसी सहमति से हुई शादी कोर्ट के अधिकारक्षेत्र में कैसे आता है? बेंच ने कहा, “हमने उसे बुलाया और उससे बात की. उसने कहा कि उसने अपनी मर्ज़ी से शादी की है. हमारी चिंता यह है कि ऐसी स्थिति में कोर्ट उसकी शादी को रद्द कैसे कर सकता है? आप कैसे पता कर सकते हैं कि उसकी सहमति सहज थी या नहीं?”


दीवान ने कहा कि हाईकोर्ट को सबूत मिले थे कि गलत मंशा से मासूम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है. इसलिए कोर्ट ने अपने आर्टिकल 226 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर शादी को रद्द कर दिया. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दीवान से पूछा, “अगर कोई गलत कामों में लिप्त है तो कानून अपना काम करेगा. अगर सरकार के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि लोगों को गलत काम के लिए विदेश में रिक्रूट किया जा रहा है तो सरकार के पास उनकी यात्रा रद्द करने के पूरे अधिकार हैं. लेकिन यहां हम पर्सनल लॉ के तहत एक रिश्ते पर बात कर रहे हैं. क्या कोर्ट इसमें दखल देकर कह सकता है कि सहमति जेन्विन नहीं थी?”

सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 8 मार्च की तारीख तय की है.

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