नई दिल्ली। आज से 43 साल पहले 26 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा हुई थी। इतने साल बीत जाने के बाद भी उन लोगों से इसकी टीस नहीं गई है जो आपातकाल में जेल गए थे। इस दौरान कई बड़े नेता थे जो इसके विरोध में उतरे और जेल की हवा खाई। उस दिन जब सफदरगंज स्थित पीएम आवास से फोन आया तो हर तरफ खलबली मच गई थी।
यह था घटनाक्रम
25 जून को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इस फरमान से पूरा मंत्रिमंडल चौंकन्ना हो गया था। सुबह के पांच बजे थे। मंत्रियों के आवास पर उनके लैंड लाइन फोन पर पीएमओ की एक काल से खलबली मच गई। इंदिरा जी ने सभी मंत्रियों को सुबह छह बजे बैठक के लिए बुलाया था। उस वक्त इंदिरा गांधी के सफदरजंग आवास पर केवल पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय मौजूद थे। प्रधानमंत्री आवास पर उस भाषण को अंतिम रूप दिया जा रहा था, जिसे इंदिरा गांधी कैबिनेट बैठक के बाद रेडियो पर देने वाली थीं।
राष्ट्रपति की मुहर लगी 26 जून 1975
उस वक्त फखरुद्दीन अली अहमद देश के राष्ट्रपति थे। सुबह कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्ताव को हरी झंडी मिल चुकी थी। अब उस पर अंतिम मुहर राष्ट्रपति को लगानी थी। प्रस्ताव पर हरी झंडी के लिए इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर उस दिन शाम 5.30 बजे राष्ट्रपति भवन पहुंचे। दोनों नेताओं ने राष्ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई। इसके बाद आपातकाल के कागज राष्ट्रपति भवन में हस्ताक्षर के लिए भेज दिए गए। राष्ट्रपति फखरुद्दीन ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई तथा बाद में सुबह मंत्रिमंडल की बैठक के बाद उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए।
पीएमओ ने लगाई थी तीन नेताओं की गिरफ्तारी पर रोक
पीएमओ में भारी सक्रियता के बीच 26 जून को तड़के इंदिरा सोने की तैयारी में जुटी थीं। उस वक्त विपक्ष के विरोध के स्वर इंदिरा के कान में गूंज रहे थे। देशभर में गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो चुका था। विपक्ष के कद्दावर नेता जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को हिरासत में लिया जा चुका था। खास बात यह है कि पीएमओ से महज तीन लोगों की गिरफ्तारी की इजाजत नहीं थी। इनमें तमिलनाडु के नेता कामराज, बिहार के समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एक और समाजवादी नेता एसएम जोशी। लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया। जेलों में जगह नहीं बची थी।
आपातकाल के लिए बना माहौल
12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगाया। हाईकोर्ट ने राज नारायण की याचिका पर सुनवाई करते हुए इंदिरा गांधी को दोषी ठहराया। इंदिरा पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल जैसे 14 आरोप लगे थे। राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी के हाथों हारने के बाद मामला दाखिल कराया था। जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने यह फैसला सुनाया था। श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस कृष्ण अय्यर ने भी इस आदेश बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दी। 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वाहन किया। 25 जून 1975 को राष्ट्रपति के अध्यादेश पास करने के बाद सरकार ने आपातकाल लागू कर दिया।
क्या है आपातकाल
देश में आंतरिक अशांति को खतरा होने, बाहरी आक्रमण होने अथवा वित्तीय संकट की हालात में आपातकाल की घोषणा की जाती है। देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का दौर देखा था, पर यह बाहरी आक्रमण के कारण लगाया गया था। 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच जो आपातकाल का दौर देश ने देखा, वह आंतरिक अशांति के करण अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था।
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