असली मजदूर को तो मालूम ही नहीं कि मजदूर दिवस भी मनाया जाता है
जबलपुर। आज 1 मई है यानि मजदूर दिवस और आज के दिन को मजदूरों के नाम पर मनाया जाता है लेकिन यदि वास्तविकता देखी जाए तो जो आम मजदूर हैं उसे इस बात का भान ही नहीं है कि श्रमिक दिवस नाम की कोई चीज भी होती है।
आजादी के बाद देश में बहुत कुछ बदला है लेकिन नहीं बदली तो सड़क पर पत्थर तोड़ते निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों की किस्मत। आज के दिन भी वे अपनी रोजी रोटी के लिए कमरतोड़ पसीना बहाने मजबूर नजर आते हैं।
रोज कमाने खाने वाले इन मजदूरों को यह भय खाया जाता है कि यदि आज काम नहीं किया तो शाम को ऐसा ना हो कि घर में चूल्हा न जले और परिवार को भूखे पेट ही सोना पड़े। दिन रात वह मेहनत करके किसी तरह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करता है लेकिन न तो उसकी सुरक्षा के कोई उपाय निर्धारित होते हैं और न ही किसी दुर्घटना में घायल होने पर उपचार की कोई व्यवस्था।
अनेक बार तो काम करते वक्त मजदूर को अपनी जान से हाथ तक धोना पड़ता है और यदि किसी निर्माण कार्य के दौरान कोई मजदूर घायल हो जाता है तो उसे ज्यादा हुआ तो सरकारी अस्पताल में भर्ती कराकर अपने दायित्वों की पूर्ति कर दी जाती है और फिर उसकी तरफ पलट कर नहीं देखा करते। यदि सरकार की बात की जाए तो सरकार सबसे ज्यादा मजदूरों और किसानों के हितों की बात करती है। किसान की क्या हालत है यह किसी से छिपी नहीं है तो वहीं दूसरी तरफ मजदूर भी अपनी जिंदगी की जंग अपने बल बूते लड़ रहा है।

शोषित पीड़ित मजदूर के साथ ज्यादाती भी कम नहीं होती
यदि केवल शहर में चल रहे निर्माण कार्यों पर नजर डाली जाए और उनमें काम कर रहे मजदूरों की दशा पर ध्यान दिया जाए तो वास्तविकता खुद ही सामने आ जाती है। मजदूरों का शारीरिक और आर्थिक शोषण आम बात है। जिन लोगों के यहां ये मजदूर काम करते हैं वे काम कराने के बाद निर्धारित पैसे से कम पैसे देते हैं और कई तो मजदूरों के पैसे ही हजम कर जाते हैं। शहर में ज्यादातर ग्रामीण इलाकों खासकर मंडला और डिंडौरी जिले के आदिवासी हैं जो स्वभाव से सीधे साधे होते हैं। कई बार तो पैसे मांगने पर मजदूरों के साथ मारपीट तक के समाचार सामने आते रहते हैं।
कोई फुटपाथ पर तो कोई झोपड़ियों में समय काटता है
शहर में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर जहां खाली जगह दिखी वहां झोपड़ी बनाकर किसी तरह रहकर काम करता है। इतना ही नहीं शहर के कई इलाके ऐसे हैं जहां फुटपाथों पर भी मजदूरों की झोपड़ियां नजर आ जाएंगी।
महिलाओं के साथ भी ज्यादतीय
ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुरुष मजदूर ही काम करते हो उनके साथ जो महिला मजदूर जिन्हें आम भाषा में रेजा कहा जाता है उनका भी शारीरिक शोषण करने के समाचार समय समय पर प्रकाश में आते रहते हैं। मजदूरों के हितों के लिए बकायदा श्रम कानून और विभाग भी है। लेकिन सुनने वाला कोई नहीं। ऐसे में मजदूर जाएं तो जाएं कहां। गांव में रोजगार की कमी होने से वे शहर आते हैं लेकिन यहां उनकी जिंदगी कैसे कटती है वह एक दिन एक मजदूर की झोपड़ी में रहकर देखी जा सकती है।
योजनाओं का लाभ नहीं
कहने को तो सरकार मजदूरों के लिए ना जाने अब तक कितनी घोषणाएं कर चुकी है लेकिन ये सभी घोषणाएं कागजी ही साबित हुई हैं।
श्रमिक दिवस सिर्फ यूनियनों तक ही सीमित
आज एक मई श्रमिक दिवस के मौके पर अनेक श्रमिक संगठनों का तमगा लगाकर घूमने वाले और मजदूरों के हितों की बात करने वाले लोगों के द्वारा अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे और यह भी तय है कि हर साल की तरह आज भी मजदूरों के हितों की रक्षा के दावे किये जाएंगे दलीलें दी जायेंगी लेकिन साल भर के लिए मजदूर फिर घर चलाने के लिए चुनौतियों से जूझता रहेगा। आम मजदूर आज भी एक अदद छत उचित वेतन व अन्न मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गुजर बसर करने को मजबूर है। ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि कैसा मजदूर दिवस और किसका मजदूर दिवस।

