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Yashbharat Exclusive: साइकिल पर मनिहारी की दुकान नहीं, यह तो देश की अर्थव्यवस्था का असली श्रंगार है

कटनी। ऑनलाइन के इस युग मे जहां कोई भी चीज मोबाइल पर एक क्लिक में हाजिर है, नामी-गिरामी व्यापारी भी स्वयं को ऑन लाइन करने में लगे हैं, वहां इस देश मे कुछ चीज या यूं कहें कि परम्पराएं आज भी यदाकदा दिख जाती हैं, जिन्हें अमूमन भुला दिया गया या फिर इसे गांव तक सीमित माना जाने लगा।

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साइकिल पर सजी मनिहारी की दुकान

ऐसा ही एक नजारा गत शाम शहर के एक प्रमुख चौराहे पर नजर आया तो बरबस कुछ पुरानी याद जेहन में ताजा हो गईं।

दरअसल कचहरी चौक के समीप साइकल पर महिलाओं की श्रंगार सामग्री बेच रहा एक व्यक्ति नजर आया तो कुछ पुरानी याद आना लाजिमी था ।

जीवित है आज भी गांव गरीब की मनिहारी, यही है जीडीपी

मन किया कि कई वर्षों बाद जब कुछ ऐसा देखा तो क्यों न इस व्यक्ति से बात ही कर ली जाए, जो न सिर्फ महिलाओं की तमाम श्रंगार सामग्री साइकल पर चलती-फिरती मनिहारी की दुकान में बेच रहा है, वरन शायद उसे भी आभाष नहीं कि वह इस देश के उस श्रंगार को भी अपनी साइकिल पर सम्भाले है जो वास्तव में भारत की शानदार परम्परा तथा इस देश मे जहां जीडीपी, मुद्रा स्फीति, शेयर मार्केट, निफिटी, सेंसेक्स, डॉलर आदि की बातें सुबह से शाम तक सुर्खियों में रहतीं हैं वहां आज भी इस तरह के पुराने व्यवसाय को जीवित रखे है।

अर्थव्यवस्था में भागीदारों को सिर्फ दुत्कार

यही नहीं ऐसे न जाने कितने छोटे- छोटे व्यवसाय रोजगार के रूप में देश की अर्थव्यवस्था में भागीदार है जिसे सरकारों ने शायद भुला ही दिया। ये साइकिल की मनिहारी ही नहीं ठेले, खुंचे, फुटपाथ पर धंधा करने वाले व्यवसायी  जिन्हें या तो खदेड़ा जाता है या फिर बेदर्दी से इनके सामान सड़क पर फेंक दिए जाते हैं, जप्त कर लिए जाते हैं, बर्बाद कर दिए जाते हैं। कतिथ तौर पर इन्ही से सारी की सारी अव्यवस्था फैलती हैं।

सायकिल पर आन लाइन मनिहारी की दुकान का गांव में आज भी इंतजार

आन लाइन के मार्किट में आज जिस ऑन लाइन की बात हम बता रहे हैं देखा जाए तो यही वास्तविक आन लाइन है। कहा जाए तो जरा भी अतिशयोक्ति नहीं कि यह ऐसा आन लाइन जो बिना आर्डर के भी गांव तक पहुंच रहा है और बिना कोरियर चार्ज के महिला के तमाम श्रंगार को उन तक पहुंचा कर उन्हें भी प्रसन्न भी रहा है। सच पूछो तो भारत के ऐसे व्यवसाय ने ही ऑनलाइन की बुनियाद रखी थी।

मुनाफा क्या खुशी तो मिल ही रही है

लाडले चौधरी नामक व्यापारी भले ही आज के युग मे मॉल, फैशन, ब्यूटीपार्लर या फिर बेंटेक्स के शोरूम जैसे तामझाम से कोसों दूर हैं,  पर सुबह से गांव-गांव घूमकर लाडले चौधरी 200 तो कभी 5 सौ का मुनाफा कमा कर खुश हैं।

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मंदी, तेजी तो अमीरों की है

कटनी के समीप कौड़िया गांव का रहने वाला यह दुकानदार साइकिल पर मनिहारी जरूर बेच रहा था मगर सरोकार उसे देश की नीति रीति से भी था। जब उससे पूछा गया कि धंधा अब कैसा?  तो बेबाकी से बताया मंदी के बारे में। जरा इस व्यापारी की मंदी को समझिये, हमने पूछा कि जमाना मंदी में है?  वह तपाक से बोला काहे की मंदी भैया मंदी तो अमीरों की है हम गरीब व्यापारी को तो रोज पता रहता है कि आज धंधे में तेजी रहेगी या मंदी। पता नहीं बड़े लोगों को यह कैसे पता नहीं चलता। हम तो सोमवार से रविवार तक जानते है कि आज किस कलर की बिंदिया बिकने वाली है या चूड़ी खरीदी जाएगी।

छोटे छोटे धंधों पर ध्यान नहीं सपना 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का

प्रश्न भले ही 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का स्वप्न देखती सरकार के लिए बेहद छोटा हो लेकिन यह तय है कि सरकारें अगर हमारे ऐसे तमाम धंधे पर ध्यान देती तो आज हो सकता है हालात कुछ और ही होते, खैर इस व्यापारी ने बताया कि अब यूं साइकिल पर बिन्दी चूड़ी कंगन खरीदने वाले गांव तक ही सीमित हैं। पर फिर भी वह खुश हैं।

सिर्फ रोजगार नहीं श्रंगार भी

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सम्भव है इस साइकिल की श्रंगार की दुकान आपने भी कभी कहीं  देखी ही हो किंतु तब शायद ही ख्याल आया हो कि यह सिर्फ एक रोजगार नहीं, गांव गरीब का श्रंगार नहीं  बल्कि हमारे देश का वह व्यापारी है जो केवल साइकिल पर डोर टू डोर सजने संवरने की सामग्री ही नहीं बेच रहा बल्कि इस देश की 70 फीसदी आबादी का वह श्रंगार है जिनसे ही अब तक इस देश की अर्थव्यवस्था सजती सँवरती आई। वास्तव में यही छोटे छोटे व्यापारी देश की अर्थव्यवस्था के श्रंगार हैं।

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम

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