मेट्रो शहरों में क्यों बढ़ रहा है ‘DINK’ लाइफस्टाइल का क्रेज? डबल इनकम, नो किड्स: आजादी, करियर या आर्थिक दबाव का फैसला

मेट्रो शहरों में क्यों बढ़ रहा है ‘DINK’ लाइफस्टाइल का क्रेज? डबल इनकम, नो किड्स: आजादी, करियर या आर्थिक दबाव का फैसला

नई दिल्ली: सुबह के 8 बजे जहां एक तरफ मेट्रो शहरों की सोसायटियों में पेरेंट्स बच्चों का टिफिन लेकर बस के पीछे भागते हैं, वहीं दूसरी तरफ कई घरों में बिना किसी हड़बड़ी के कॉफी की चुस्कियों के साथ अगले वेकेशन की प्लानिंग चल रही होती है। यह कहानी है देश के बड़े शहरों में तेजी से उभर रहे ‘DINK’ (Double Income, No Kids) कपल्स की। यानी ऐसे शादीशुदा जोड़े जहां पति-पत्नी दोनों कमाते तो हैं, लेकिन उन्होंने बच्चे न पैदा करने का फैसला लिया है। दिल्ली-NCR, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे महानगरों में यह कल्चर अब सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा जीवनशैली का फैसला बनता जा रहा है।

कमाई लाखों में, फिर भी बच्चे का फैसला क्यों मुश्किल?

हाल ही में सोशल मीडिया पर गुरुग्राम के एक कपल का अनुभव काफी चर्चा में रहा, जिनकी संयुक्त सालाना आय 36 लाख रुपये है। उन्होंने बताया कि इतने बजट के बाद भी गुरुग्राम जैसे शहर में मनमुताबिक घर खरीदना ही आर्थिक रूप से काफी भारी पड़ रहा है।

बच्चे की परवरिश और कोचिंग का गणित

सरकारी आंकड़ों और नेशनल सर्वे के अनुसार, शहरों में पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ रहा है:

स्तर प्राइवेट स्कूल का औसतन सालाना खर्च प्राइवेट कोचिंग का औसतन सालाना खर्च
प्री-प्राइमरी (Pre-Primary)

₹26,188 (राष्ट्रीय औसत)

–
हायर सेकेंडरी (Higher Secondary)

₹49,075 (राष्ट्रीय औसत)

₹9,950 (राष्ट्रीय औसत)

नोट: मेट्रो शहरों के प्रीमियम स्कूलों, डे-केयर, एक्स्ट्रा-करिक्युलर गतिविधियों और ट्रांसपोर्ट का खर्च इस राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यही कारण है कि DINK कपल्स बच्चे की जिम्मेदारी न लेकर अपनी आय का बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट, यात्रा, निवेश और अपने व्यक्तिगत शौक पर खर्च करना बेहतर समझते हैं।

पैसा ही नहीं, टाइम और करियर भी बड़ी वजह

बदलता फैमिली मैप और सोशल मीडिया का प्रभाव

DINK केवल ‘नो किड्स’ का निर्णय नहीं है, बल्कि यह इस बात का चुनाव है कि कोई कपल अपनी जिंदगी में पैसे, करियर, आजादी और रिश्तों के बीच किस चीज़ को प्राथमिकता देना चाहता है।

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