हिंसा समस्त जीवों को अप्रिय है इसलिए वह घोर पाप है,मित्तल एनक्लेव में राष्ट्र संत डॉ मणिभद्र महाराज साहब के धर्मवचन में उमडी श्रद्बालुओं की भीड
हिंसा समस्त जीवों को अप्रिय है इसलिए वह घोर पाप है,मित्तल एनक्लेव में राष्ट्र संत डॉ मणिभद्र महाराज साहब के धर्मवचन में उमडी श्रद्बालुओं की भी
कटनी।परम पूज्य गुरुदेव अंतर्राष्ट्रीय मानव मिलन के संस्थापक, नेपाल केसरी, राष्ट्र संत डॉ मणिभद्र महाराज साहब थाण का आज अप्रैल को प्रातःकटनी जैन स्थानक से विहार करके नगर के उद्योगपति श्री ललित मित्तल के निवास स्थान मित्तल एनक्लेव में आगमन हुआ जहाँ मित्तल परिवार ने महाराज श्री का पुष्पा मालाओं से आत्मीय अभिनंदन किया।
मित्तल परिवार से पवन मित्तल ललित मित्तल सुरेश मित्तल विजय मित्तल ने महाराज श्री का स्वागत वंदन कर आशीर्वाद लिया।
महाराज श्री ने मित्तल एनक्लेव में धर्मवचन में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुये कहा कि आध्यात्मिक जगत का सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख सूत्र है अहिंसा। अहिंसा सर्व आश्रमों का हृदय है, सर्व शास्त्रों का गर्भ है और सर्व व्रतों का सार है।अहिंसा धर्म के जगत का प्रवेशद्वार है। अहिंसा से ही धर्म की यात्रा शुरू होती है। जैसे-जैसे हम अहिंसा में पूर्ण होते हैं वैसे-वैसे हम धर्म में पूर्ण होते हैं। अहिंसा ही अपने आप में धर्म है।
अहिंसा का अर्थ है, हिंसा से मुक्त होना, हिंसा से ऊपर उठ जाना। यदि हम ठीक से देख सकें तो हम पाएंगे कि हमारा समग्र जीवन हिंसा से घिरा हुआ है। हिंसा से हम इतने आकण्ठ हैं कि हमारा सांस लेना भी हिंसा के बिना संभव नहीं है। अभिमन्यु के लिए चक्रव्यूह को तोड़ना जितना दुष्कर न था हमारे लिए जितना पुष्कर है हिंसा के चक्रव्यूह को तोड़ना उसी गुलामी के कारण वह अन्य को अपना गुलाम बनाना चाहता है। पर अन्य को गुलाम बनाते-बनाते वह स्वयं अन्य का गुलाम बन जाता है।
हिंसा समस्त जीवों को अप्रिय है इसलिए वह घोर पाप है। घोर पाप है इसलिए वह त्याज्य है। जगत के समस्त जीव चाहते हैं कि हम जीएं, और सुख से जीएं, अतः समस्त को जीने में सहयोग देना और सुखपूर्वक जीने में सहयोग देना हिंसा है।वह कौन-सी विधि है जिसके द्वारा हम हिंसा से मुक्त बन सकें? भगवान महावीर ने कहा, वह विधि हैं, यतना। जब हम यतना को साथ लेते हैं तो हिंसा से ऊपर उठ जाते हैं। यतना का अर्थ है, समग्र होशपूर्वक क्रियाओं को साधना।
जैन दर्शन कहता है, मूर्च्छा ही परिग्रह है। मूर्च्छा का अर्थ है आसक्ति। हम वस्तुओं या व्यक्तियों में आसक्त हैं तो हम परिग्रही हैं।भगवान महावीर आत्मसंपदा की पहचान पा गए तो उनके समस्त परिग्रह मिट गए। वे अपने भीतर में ही महान सम्राट हो गए, चक्रवर्ती बन गए। अपना सम्राट होना ही परम गौरवमयी है। बाहर के सम्राट होने की दौड़ में तो हम और भी बड़े गुलाम बन जाएंगे… अपने गुलामों के भी गुलाम बन जाएंगे।
भगवान महावीर के बहुमूल्य से बहुमूल्य अवदानों में से एक अवदान है, अपरिग्रह संदेश। अपरिग्रह आत्म-स्वतंत्रता का उच्चतम उद्घोष है। गुलाम वे ही नहीं हैं जो सामान्यतः गुलाम दिखाई देते हैं। वे लोग उनसे भी बड़े गुलाम हैं जो सम्राट दिखाई देते हैं। गुलाम के बंधन तो बहुत अल्प हैं। सम्राट जिन बंधनों में बंधे हैं वे बंधन असंख्य हैं। जटिलतम हैं। वे अपने गुलामों के भी गुलाम हैं।
अनेकांत दर्शन पर महाराज जी कहा
बुद्ध अपने शिष्यों के साथ जंगल से जा रहे थे। एक स्थान पर रुककर उन्होंने कुछ पत्तियां अपने हाथ में लीं और अपने शिष्यों से पूछा, भिक्षुओं ! मेरे हाथ में रही हुईं पत्तियां अधिक हैं या जंगल में वृक्षों पर लगी पत्तियां अधिक हैं?
शिष्यों ने कहा, भगवन! आपके हाथ में तो थोड़ी-सी पत्तियां हैं। पूरे जंगल में असंख्य वृक्ष हैं और उन पर असंख्य पत्तियां हैं। सहज स्पष्ट है कि आपके हाथ में रही हुई पत्तियों की तुलना में जंगल में रही हुई पत्तियां कहीं अधिक हैं।
बुद्ध बोले, भिक्षुओं! सदैव स्मरण रखना कि मैंने तुम्हें जो सत्य दिया है वह मेरे हाथ में रही हुई पत्तियों जितना ही है। शेष सत्य जो बच गया है वह इतना है जितनी जंगल की पत्तियां हैं। इसलिए ‘मेरे दिए’ को ही समग्र और अन्तिम मत मान लेना। सत्य अनन्त है। जहां भी तुम्हें सत्य दिखाई पड़े उसे ग्रहण कर लेना !
इस मौके पर मित्तल परिवार सहित बडी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही।








