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Sena Rituals In India: सेना की वो रस्म जब सिपाही हो जाता है भावुक, पढ़िये आंखें नम होने की ये कहानी

नई दिल्‍ली। Sena Rituals In India सेना की वो रस्म जब सिपाही भावुक हो जाता है। लांस नायक को 17 साल, नायक को 22 साल और हवलदार को 24 साल की आयु में रिटायरमेंट देने का प्रावधान है। खास बात ये है कि इन्हें रिटायरमेंट उसी यूनिट या सेंटर से मिलती है, जहां इन्होंने भर्ती होने के बाद अपनी बेसिक ट्रेनिंग पूरी की थी…

वो रस्म जब सिपाही हो जाता है भावुक

उस दिन सभी जवानों के चेहरे पर तेज होता है। बिल्कुल उसी तरह, जब वे सेना में भर्ती होने के बाद ट्रेनिंग पूरी कर पासिंग आउट परेड में हिस्सा लेते हैं। उसके बाद वे ‘अंतिम कदम’ रखते हुए सेना का हिस्सा बनते हैं। इसके बाद उन्हें पहली पोस्टिंग मिलती है। इन सबके बीच सेना में एक ऐसी रस्म भी होती है, जब सिपाही भावुक हो जाते हैं। सिपाही ही नहीं, बल्कि सेंटर कमांडर तक के अफसरों की आंखें नम हो जाती हैं।

15 या 17 साल की सेवा पूरी करने के बाद जब कोई सिपाही, फौज को अलविदा कहता है तो उसके लिए बाकायदा एक रस्म अदा की जाती है। सेवानिवृत्ति पर जाने वाले सभी सिपाही उसी सेंटर पर बुलाए जाते हैं, जहां उन्होंने सेना में भर्ती होने के बाद ट्रेनिंग पूरी की थी। उस खास तारीख को दोपहर 12 बजे के बाद सिपाही का बीमा भी खत्म हो जाता है।

15 साल की सेवा करने के बाद रिटायरमेंट ले लेते हैं

भारतीय सेना की हर यूनिट में बहुत से सिपाही ऐसे होते हैं, जो 15 साल की सेवा करने के बाद रिटायरमेंट ले लेते हैं। किसी के घर में कोई दिक्कत होती है तो कोई खुद ये इच्छा जाहिर करता है कि अब वह सिविल जॉब में जाना चाहता है। कई बार सेना भी कुछ मामलों में रिटायरमेंट देती है। यदि किसी सिपाही को 15 साल से पहले पदोन्नति मिल गई है तो उसे 15 वर्ष की सेवा पूरी होते ही सेवानिवृत्ति मिल सकती है।

लांस नायक को 17 साल, नायक को 22 साल और हवलदार को 24 साल की आयु में रिटायरमेंट देने का प्रावधान है। खास बात ये है कि इन्हें रिटायरमेंट उसी यूनिट या सेंटर से मिलती है, जहां इन्होंने भर्ती होने के बाद अपनी बेसिक ट्रेनिंग पूरी की थी। जैसे सेना की आर्म्ड कोर में इस तरह की रिटायरमेंट देने के लिए एक दिन भी तय किया जाता है। जिस माह रिटायरमेंट होता है, उसकी पांच तारीख तक ऐसे सभी सिपाही या हवलदार अपने सेंटर पर पहुंच जाते हैं।

कोई सिपाही दस तारीख तक भी वहां पहुंच सकता है। इसके बाद वे सेवानिवृति की औपचारिकताएं पूरी करते हैं। महीने की अंतिम तारीख पर एक समारोह आयोजित किया जाता है। वैसे तो इसमें सेंटर कमांडर जो लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का होता है, पहुंचते हैं। कई बार उनके जूनियर अधिकारी भी इस रस्म को पूरा कराते हैं। फौज में सिपाही के लिए यह आखिरी दिन होता है। उसका बीमा भी दोपहर 12 बजे खत्म हो जाता है।

इसके बाद सेवानिवृति के फायदों में शामिल बीमा शुरू होता है। सभी जवान पूरी तैयारी के साथ मैदान में पहुंचते हैं। पासिंग आउट परेड के दौरान जैसी वर्दी उन्होंने पहनी थी, वैसी ही चमक धमक वाली वर्दी वे रिटायरमेंट के दिन पहनते हैं। अपने कमांडर के सामने जाते हैं। कमांडर, सिपाहियों से बातचीत कर उनका अनुभव पूछते हैं। यह एक ऐसा दिन होता है, जब सिपाही अपने मन की बात सामने खड़े अफसर से खुल कर करता है।

विदाई के दौरान बहुत से सिपाहियों की आंखें नम हो जाती हैं

बहुत से कमांडर अपने सिपाहियों से यह भी कहते हैं कि सिविल लाइफ में अगर उन्हें कोई काम हो तो बता सकते हैं। कहीं कोई मदद चाहिए तो उसके लिए फौज सदैव तैयार रहेगी। छोटी सी पार्टी होने के बाद सिपाही अपनी बैरक में पहुंच जाते हैं। विदाई के दौरान बहुत से सिपाहियों की आंखें नम हो जाती हैं। कमांडर भी भावुक हो उठते हैं।

इसके बाद सिपाही अपनी बैरक में जाकर वर्दी उतारते हैं। यही वो क्षण होता है, जब वे भावुक हो उठते हैं। अपने ट्रेनिंग सेंटर की यादें ताजा करते हैं। जाने से पहले वे सेंटर में जरूरतों से जुड़ा कोई सामान जैसी एसी, कूलर, कुर्सी टेबल, लाइट, पंखें या कुछ और वस्तुएं भेंट करते हैं। इन पर उनकी यूनिट का नाम लिखा जाता है। कुछ देर बाद वे सिविल कपड़े पहनकर मुख्य गेट की ओर चल पड़ते हैं।

अगर किसी की ट्रेन अगली सुबह है तो वे रात को वहीं ठहरते हैं। मुख्य गेट पर वे सेंटर की ओर देखते हुए माथा टेकते हैं। बहुत से जवान सैल्यूट करते हैं और राष्ट्रगान भी गाते हैं। कुछ जवान ऐसे होते हैं, जो अपने जूते और वर्दी, वहां काम करने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मी को दे देते हैं। चूंकि उनके पास वर्दी के दो तीन जोड़े होते हैं, इसलिए वे एक जोड़ा अपने साथ ले आते हैं। यह इसलिए, ताकि जीवन में उन्हें फौज का आत्मबल, सम्मान और गौरव याद आता रहे।

 

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम