National Education Policy 2020 : नई शिक्षा नीति को लेकर चल रहा राष्ट्रीय विमर्श वस्तुत: देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में उसके क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
किसी भी नई व्यवस्था को जांचने व परखने और उसके गुण-दोष की विवेचना करने के बाद जब उसे अंगीकार किया जाता है, तो निश्चित ही वह सुपरिणामकारी होता है।
देश की स्वाधीनता के बाद शिक्षा व्यवस्था की समग्र दृष्टि को लेकर गठित कोठारी आयोग व उसके बाद बनाई गई दूसरी शिक्षा समितियों की रिपोर्ट भी इतनी चर्चा में नहीं रहीं, जितनी यह नई शिक्षा नीति।
वास्तव में यह शिक्षा व्यवस्था में 34 साल के सुदीर्घ ठहराव की जड़ता को तोड़ने वाला एक युगांतरकारी प्रयास है।
विशेषकर देश की शिक्षा व्यवस्था को ब्रिटिश शासन की औपनिवेशिक मानसिक गुलामी से मुक्त कर, भारत बोध से जोड़ने का यह एक ऐतिहासिक कदम है।
यह विडंबना ही है कि देश की स्वाधीनता के 73 साल बीतने पर भी हम शिक्षा के माध्यम से भारतीय जन-मन के अंत:करण में भारत के प्रति राष्ट्रीय स्वाभिमान व राष्ट्रीयता का बोध सुदृढ़ करने में कहीं न कहीं चूके हैं।
एक स्वतंत्र राष्ट्र में अपने महान स्वाधीनता सेनानियों व बलिदानियों को रिवोल्यूशनरी टेररिस्ट के रूप में पाठ्य पुस्तकों में चित्रित किया जाना इसकी छोटी सी बानगी है।
यह और ऐसे दूसरे भी कई उपक्रम जिनमें विद्यालय में सरस्वती वंदना को किसी खास मजहबी नजरिये से शिक्षा का सांप्रदायीकरण बताकर उसे बंद करा दिया जाना तक शामिल है।
भारत के प्रति एक राष्ट्र के रूप में आत्महीनता का बोध जगाने वाली और एक जन-एक राष्ट्र की अवधारणा, जिसे देश के संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग कह कर परिभाषित किया गया है, को जातिगत, सामाजिक, क्षेत्रीय व भाषायी विभेदों में ढालने वाली बौद्धिक जमात खड़ी करना शायद इस शिक्षा व्यवस्था को ज्यादा रास आया।
कहीं न कहीं यह मैकाले जनित भारत विरोधी शिक्षा नीति का असर माना जाना चाहिए।
नई शिक्षा नीति के दस्तावेज में भारत बोध को सुदृढ़ करना एक महत्वपूर्ण प्रयास है। शिक्षा समाज व राष्ट्रीय जीवन को मूल्यपरकता के साथ गढ़ने वाला तत्व है।
यह केवल रोजगार या डिग्री लेकर अभिजात्य श्रेणी में खड़ा हो जाने का उपक्रम नहीं है।
गुरु नानक ने कहा है- विद्या विचारी तां परोपकारी यानी विद्या व्यक्ति को विचारवान और विवेकशील बनाती है, ताकि वह परोपकारी और सामाजिक भावना से युक्त होकर एक अच्छे मनुष्य के रूप में जीवन जी सके।
नई शिक्षा नीति इसी भाव बोध के साथ हमारे विद्याíथयों को व्यक्ति से मनुष्य बनाने की प्रक्रिया को मजबूत करने वाली है। इसमें मानव संसाधन विकास मंत्रलय का नाम शिक्षा मंत्रलय किया जाना केवल नाम भर का बदलाव नहीं है।




















