Monday, April 6, 2026
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Katni कलेक्ट्रेट के सामने रात में भूख हड़ताल पर बैठी मां-बेटी, बेपरवाह प्रशासन, जनिये पूरा मामला

कटनी। कटनी कलेक्ट्रेट से सामने फुटपाथ पर एक मां अपनी युवा बेटी के साथ धरने पर बैठी है। सुबह से ही दोनो यहां बैठी हैं।

इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाए कि मां बेटी की सुध न तो जिम्मेदार अधिकारी ले रहे न ही जनप्रतिनिधियों ने इसकी परवाह की।

रात घनघोर होती जा रही है ऐसे में अब तक इन मां बेटी का इस तरह सड़क पर बैठा रहना किसी घटना को जन्म दे सकता है।

तत्काल जिले के जिम्मेदारों को इनकी बात सुननी चाहिये। बताया गया कि दोनों ने सुबह से ही भूख हड़ताल भी की है मतलब इन लोगों ने भोजन भी नहीं किया।

क्या है मामला

माँ-बेटी कलेक्टर कार्यालय के सामने सुबह से भूख हड़ताल पर बैठी हैं। ये वृंदावन कॉलोनी निवासी रश्मि जायसवाल हैं। बताया गया कि पिछले पांच साल से यह लोन के लिए भटक रही हैं।

सूत्रों के अनुसार शासन के खिलाफ दोनो धरने पर इसलिए बैठी हैं क्योंकि ये दोनों अपनी जीविका चलाने के लिए स्वरोजगार करना चाहती हैं।

दफ्तरों में भटकने के बाद भी तमाम सरकारी स्वरोजगार योजना से इन मा बेटी को कोई सहायता नहीं मिल सकी। स्वरोजगार योजना से लोन न मिलने से परेशान महिला अपनी बेटी के साथ अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठ गईं।

सूत्रों ने बताया कि मां बेटी सेनेटरी पैड का उद्योग शुरू करने के लिए लोन अप्लाई किया था लेकिन 5 साल से सरकारी अड़ंगे ने इनको किसी न किसी बहाने सिर्फ इधर से उधर भटकाया गया।

महिला के पति की मृत्यु हो चुकी है। आर्थिक तंगी से जूझते हुए दोनो अपनी मेहनत से स्वरोजगार करना चाहती हैं, लेकिन दोनों को तमाम डींगें हांकने वाले जिला प्रशासन ने कोई सहयोग नहीं किया।

थक हार दोनो के सामने इस आंदोलनात्मक कदम के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझा। इन्हें क्या पता था कि सरकार और उसके नुमाइंदे इनके इस कदम पर भी पसीजने वाले नहीं हैं।

पांच साल से उद्योग विभाग का चक्कर लगा रहीं

पांच साल से उद्योग विभाग के चक्कर लगा रही हैं, उद्योग विभाग के जिला प्रबंधक, कलेक्टर, आयुक्त, प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री सहित प्रधानमंत्री कार्यालय को भी अपनी समस्या बता चुकी हैं लेकिन कोई हल नहीं निकला है।

रश्मि का कहना है कि जब भी लोन के लिए बैंक में एप्लाई करती हैं तो उन्हें कह दिया जाता है कि तुम्हारा लोन स्वीकृत नहीं होगा। उन्होंने आगे बताया कि पहले उन्हें उम्मीद थी कि सरकारी नौकरी लग जाएगी इसलिए मेहनत कर चार बार पीएससी का एक्जाम भी दिया लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। बेटी के भविष्य की चिंता में प्राइवेट नौकरी करती हैं ताकि बेटी को अच्छे से पढ़ा सकें लेकिन वो सपना भी अधूरा सा ही नजर आता है।

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम