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आउटसोर्स नियुक्ति पर सरकार ने बदला रुख, तीन साल पुराना आदेश किया निरस्त

भोपाल। प्रदेश सरकार ने चतुर्थ श्रेणी के पदों को आउटसोर्स माध्यम से भरने संबंधी लगभग पौने तीन साल पुराने फैसले को निरस्त कर दिया है। वित्त विभाग द्वारा 31 मार्च 2023 को जारी नीति-निर्देशों को वापस लेने के बाद अब किसी भी विभाग में चतुर्थ श्रेणी के पदों पर आउटसोर्स के जरिए नई नियुक्ति नहीं की जा सकेगी। इस फैसले को सरकार के नीतिगत बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि राज्य शासन ने पहले ही चतुर्थ श्रेणी के पदों पर नियमित भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा रखी है। ऐसे में 2023 में जारी आदेश के तहत यह व्यवस्था की गई थी कि नियमित भर्ती होने तक तात्कालिक आवश्यकता के आधार पर ठेकेदारों के माध्यम से आउटसोर्स कर्मियों की सेवाएं ली जा सकेंगी। नीति के तहत यह जिम्मेदारी संबंधित विभागाध्यक्षों को दी गई थी कि वे आवश्यक पदों की पहचान कर अस्थायी रूप से आउटसोर्स व्यवस्था अपनाएं।

अब उक्त आदेश निरस्त होने के बाद आउटसोर्स नियुक्तियों का रास्ता भी बंद हो गया है। इससे एक ओर जहां विभागों की अस्थायी व्यवस्था प्रभावित होगी, वहीं लंबे समय से कार्यरत आउटसोर्स और अस्थायी कर्मचारियों की उम्मीदें एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई हैं।

आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने की मांग तेज
मध्य प्रदेश अस्थायी एवं आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कसूदेव शर्मा ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे संवेदनशील कदम बताया है। उन्होंने कहा कि संगठन लंबे समय से सभी विभागों में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के अधिकारों की आवाज उठाता आ रहा है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि चतुर्थ श्रेणी के पदों पर आउटसोर्स के बजाय सरकार को स्वयं नियमित भर्ती करनी चाहिए। ग्राम पंचायतों, स्कूल शिक्षा विभाग, आदिम जाति कल्याण विभाग के स्कूल व छात्रावास, स्वास्थ्य, लोक निर्माण, शिक्षा, विद्युत, वन विभाग, नगरीय निकाय, सहकारिता संस्थाओं, ऑयल सेक्टर एवं राष्ट्रीयकृत बैंकों सहित विभिन्न विभागों में वर्षों से कार्यरत आउटसोर्स, अस्थायी एवं संविदा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को तत्काल नियमित किया जाना चाहिए।

कसूदेव शर्मा ने कहा कि 15 से 20 वर्षों से ये कर्मचारी असुरक्षा और अन्याय के दौर से गुजर रहे हैं। नियमितीकरण से न सिर्फ उनका शोषण खत्म होगा, बल्कि वे भी सम्मान और निश्चितता के साथ अपना जीवन यापन कर सकेंगे। सरकार के इस ताजा फैसले के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या राज्य शासन आगे चलकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस नीति लाएगा या नहीं।

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