लाखों शिष्यों को अंतिम संस्कार में न पहुंच पाने की पीड़ा
कटनी। कल सारा दिन और सुबह से ही दद्दा जी के दर्शन करने शहर के अलावा आस-पास के जिलों से भी लोगों के पहुंचने का क्रम जारी रहा। दूर शहरों में स्थित दद्दा जी के शिष्यों को गुरूदेव की अंतिम यात्रा में शामिल न हो पाने की पीड़ा लंबे समय तक सालती रहेगी। यह सत्य भी है कि परमप्रतापी, अविनाशी और त्रिकालदर्शी दद्दाजी जिस अंतिम विदाई के हकदार थे, कोरोना संकट के चलते वैसा संभव नहीं हो पाया इसके बावजूद दद्दा शिष्य मंडल सूझबूझ का परिचय देते हुए कटनी के दद्दाधाम में स्थित श्रीकृष्ण वृद्धाश्रम में ही अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। चूंकि दद्दा के प्रति आस्था रखने वाले लाखों लोगों को कटनी पहुंचने से रोकना कठिन था लिहाजा सोशल मीडिया से लेकर संचार के अन्य साधनों से बार-बार यही आग्रह किया जाता रहा कि जो शिष्य जहां मौजूद है वहीं से पूज्य दद्दाजी को श्रद्धासुमन अर्पित करे।
इसके बावजूद रोकते-रोकते भी बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ अंतिम संस्कार के दौरान जमा हो गई। सामाजिक समरसता का वातारण तैयार किया आयोजनों से
शिवलिंग निर्माण की एकदम सरल विधि के जरिए दद्दा जी न केवल लोगों को धर्म से जोड़ा वरन एक पंडाल में सबको उपस्थित होने का अवसर देकर सामाजिक समरसता का भाव भी पैदा किया। उनके पूजा पंडालों में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं होता था। यहां तक की पूजन सामग्री भी खुद लेकर नहीं आना होती।
सबकुछ यज्ञ स्थल पर ही मिल जाता है। बड़ी संख्या में इन आयोजनों से लोग लगातार जुड़ते चले गये और आस्था के सैलाब में पूज्य दद्दा जी को पूरे भारतवर्ष में लोकप्रिय बना दिया। ऐसे संत शिरोमणि के महाप्रयाण से जो स्थान रिक्त हुआ है उसकी भरपाई शायद ही हो पाए। वे गृहस्थ संत अवश्य थे किंतु उन्होंने पूरा जीवन किसी तपस्वी की भांति ही जिया।
परिवार के साथ रहने के बावजूद वे समाज के बनके रहे। सारा जीवन उन्होंने भगवत भक्ति में देते हुए सार्वजनिक हित के बारे में ही सोचा। उनके धार्मिक आयोजनों में जनकल्याण की भावना ही निहित होती थी। उन्होंने पूरे मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत में आध्यात्म और ज्ञान की जो अलख जगाई है उसकी रोशनी सदैव प्रज्जवलित होती रहेगी। जब-जब शिवलिंग निर्माण के आयोजन होंगे, दद्दा जी निराकार स्वरूप में सदैव विद्यमान रहेंगे।
फूलों से सजे वाहन में रखी गई पार्थिक देह
फूलों से सजे वाहन में जब दद्दा जी की पार्थिव देह रखी गई तो वहां मौजूद हर आंख नम हो गईं। अपने भगवान को विदा देने के लिए के लिए पहुंचे लोगों ने अंतिम दर्शन कर सदा के लिए दद्दा जी की यादें अपने सजल नेत्रों में बसा ली। अंतिम यात्रा में भजन कीर्तन के साथ गगनभेदी स्वर गूंजते रहे- जब तक सूरज चांद रहेगा, दद्दा जी का नाम रहेगा। कूड़ा वाले कन्हैया की जय-जय के जयघोष के बीच पुष्पवर्षा के साथ उनके पार्थिव शरीर के श्रीकृष्ण वृद्धाश्रम के बाजू में स्थित परिसर में ले जाया गया जहां राजकीय सम्मान के साथ दद्दा जी के अंतिम संस्कार की रस्म अदा की गई।

