रैणी से ही शुरू हुआ था ‘चिपको आंदोलन’, गौरा देवी ने 21 महिलाओं के साथ किया था पेड़ काटने का विरोध
देहरादून: चमोली जिले का रैणी गांव। यह ‘चिपको आंदोलन’ की नेत्री गौरा देवी का वही गांव है, जिसने देश-दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाई। आज यही गांव पर्यावरणीय संकट के कारण आपदा की विभीषिका झेलने को मजबूर है।
चिपको आंदोलन की शुरूआत 26 मार्च 1974 को रैणी गांव से हुई थी। इस साल जब रैणी के जंगल में लगभग 2500 हरे-भरे पेड़ों को काटने के लिए नीलामी हुई तो गांव की ही एक सीधी-साधी महिला गौरा देवी ने अन्य महिलाओं के साथ इस नीलामी का जमकर विरोध किया। इस पर भी सरकार और ठेकेदार के निर्णय में कोई बदलाव नहीं आया। जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे तो गौरा देवी और साथी 21 महिलाओं ने उन्हें समझाने की कोशिश की। जब उन्होंने पेड़ काटने की जिद की तो इन महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हेंं ललकारा। बोलीं, ‘पहले हमें काटो, फिर इन पेड़ों को भी काट लेना।’
आखिरकार ठेकेदार को बैरंग लौटना पड़ा। बाद में स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने इन महिलाओं ने मजबूती से अपनी बात रखी। नतीजा, रैणी गांव का जंगल नहीं काटा गया। ग्राम पंचायत रैणी के वन पंचायत सरपंच राकेश राणा बताते हैं कि रविवार को जो-कुछ घटा, वह प्रकृति को नुकसान पहुंचाने का ही नतीजा है।उनकी कहानी पुस्तकों में आज भी देखने को मिलती है। एक सशक्त महिला के रूप में भी गौरा देवी ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों को विरोध करने और आगे आने का संदेश दिया।








