राजनाथ ने कहा-हम दिल भी जीत रहे हैं, लड़ाई भी जीतेंगे
न्यूज डेस्क। साल पहले जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आई थी तो बड़ा नारा था- अच्छे दिन आने वाले हैं। कुछ वक्त गुजरा तो सरकार की ओर से नारा दिया गया कि देश बदल रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि कुछ क्षेत्रों में अच्छे दिनों की झलक मिली, कई क्षेत्रों में बदलाव की आहट भी सुनाई दी और भरोसा भी पैदा हुआ। भ्रष्टाचार पर लगाम के बाद आतंकवाद पर नियंत्रण सरकार की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन नीचे तक आम आदमी की सुरक्षा भी ऐसा क्षेत्र है जिसकी ओर लोग बड़ी आशा से देख रहे हैं।
हालांकि संघवाद और राज्यों के अधिकारों का दायरा केंद्र सरकार का हाथ बांधता है लेकिन जब केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में राजनाथ सिंह सरीखे नेता मौजूद हों तो यह आशा भी होती है कि वह अपने व्यक्तिगत संबंधों और अनुभवों का असर दिखाएंगे। खासकर तब जबकि अधिकतर राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। सुरक्षा के मुद्दे पर सख्त राजनाथ ने नक्सलवाद और उग्रवाद जैसी समस्याओं पर लगाम लगाने में तो योग्यता साबित की लेकिन स्मार्ट पुलिसिंग पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाया।
सरकार में आने से पहले जनसुरक्षा को लेकर बड़ा आश्वासन दिया गया था, लेकिन नक्सलियों की समस्याएं बनी हुई हैं। कश्मीर अब भी काबू में नहीं है, पूर्वोत्तर भारत में भी पूरी तरह से शांति नहीं आई है। गृहमंत्री के रूप में आप इसे किस रूप में देखते है?
जवाब -देखिए, आपकी ओर से जितनी भी समस्याएं गिनाईं गई हैं, वो दो चार साल की नहीं, बल्कि पिछले 40-50 साल की समस्याएं है। सुरक्षा परिदृश्य की बात करें, तो कोई भी सहज रुप से इस सच्चाई को स्वीकार करेगा कि इन चार सालों में पूरे देश के सुरक्षा परिदृश्य में काफी सुधार हुआ है। हालांकि अभी भी इसमें सुधार की जरुरत है। पूर्वोत्तर में उग्रवाद के 70 फीसदी मामलों में कामयाबी मिली है। वहां की स्थिति कमोबेश काफी शांत है। यह सच्चाई है, जिसे सभी स्वीकार करेंगे। माओवाद की बात करें तो इस मोर्चे पर भी काफी सफलता मिली है। जब से माओवाद और नक्सलवाद शुरु हुआ, तब से सबसे कम घटनाएं 2017 में हुई हैं। इनकी संख्या घटकर एक हजार से नीचे चली गई है। इसमें छोटी-मोटी घटनाएं भी है। जैसे नक्सलियों द्वारा किसी को धमकी देना, ट्रांसफार्मर चोरी करना आदि। पहली बार ऐसा हुआ है कि माओवादियों की तुलना में सिक्योरिटी फोर्स और आम नागरिको की कम मौतें हुई हैं। बड़ी संख्या में नक्सली सरेंडर कर रहे है। न सिर्फ वारदात की संख्या बल्कि वारदात करने का उनका दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है। सुरक्षा बलों की ये सभी बड़ी कामयाबी है।
नक्सली और पूर्वोत्तर समस्या जैसे मामलों में जरूर सफलता दिख रही है लेकिन आज भी आम आदमी और खासकर महिलाएं रोजमर्रा के जीवन में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो में अपराध के बढ़ते आंकड़ें इसके सबूत हैं।
जवाब-जहां तक आम आदमी की सुरक्षा का सवाल है, आप जानते हैं कि कानून और व्यवस्था केंद्र सरकार का विषय नहीं है। यह राज्य सरकारों के दायरे में आता है। राज्य सरकार को इसमें भूमिका निभानी पड़ती है। केंद्र सरकार उसमें अपना अधिकतम सहयोग दे सकता है और हमलोग अधिकतम सहयोग दे रहे है। जैसे उनकी पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए हम सहयोग करते हैं। वहीं, समय-समय पर हम उन्हें खुफिया सूचनाएं भी मुहैया कराते रहते है। हम देश के संघीय ढांचे का सम्मान करते है, इसीलिए राज्यों के मामले में हस्तक्षेप नहीं करते है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पुलिस सुधारों की गाड़ी अटकी हुई है। राज्यों में पुलिस के लाखों पद खाली हैं। अपराध की जांच और सुरक्षा व्यवस्था के लिए अलग-अलग पुलिस बल की तैनाती को अभी तक लागू नहीं कराया जा सका है।
जवाब-अपराध की जांच और कानून-व्यवस्था के लिए अलग-अलग पुलिसिंग का प्रयोग अभी हम दिल्ली में ही शुरू करने जा रहे हैं। इस मामले में दिल्ली के उपराज्यपाल से बातचीत हुई है। थोड़ा इंतजार कीजिए।
सवाल-लेकिन केंद्र सरकार की ओर से यह कहकर बचना कि कानून व्यवस्था राच्य का विषय है, कहां तक तर्कसंगत है? ज्यादातर राच्यों में आपकी सरकारें हैं। ऐसे में आपकी जिम्मेदारी ज्यादा है।
जवाब- नहीं मैं जिम्मेदारी से भागने की बात नहीं कह रहा हूं। लेकिन इस बात की गारंटी देता हूं कि देश में सुरक्षा परिदृश्य पूरी तरह से चाक-चौबंद हुआ है। मैं समझता हूं कि दुनिया का कोई भी देश शत प्रतिशत सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता है। इसके लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए। हमलोग इसे बहुत ही गंभीरता से ले रहे हैं। साथ ही अपराध को रोकने के लिए नई-नई तकनीक पर प्रयोग भी हो रहा है। लेकिन एक बात फिर से कहना चाहता हूं कि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राच्य सरकारों के पास होने के कारण अपराध रोकने में केंद्रीय भूमिका उन्हें ही निभानी होगी। हम मदद की भूमिका में ही रहेंगे।
कश्मीर में उग्रवाद की घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पीएम ने कश्मीरियों का दिल और भरोसा जीतने की बात कही थी, उसका असर नहीं दिख रहा है। आतंकी हमलों से लेकर पत्थरबाजी की घटनाएं बदस्तूर जारी है। कश्मीर में सरकार से कहां चूक हुई?
जवाब- कश्मीर में स्थायी शांति के लिए लंबा प्रयत्न करना होगा। इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकता है कि आपने जो कदम उठाए हैं, उससे समस्या का समाधान हो ही जाएगा। मैनें बताया कि ये सब पुराने मामले हैं। आपने देखा होगा कि वर्ष 1990 में क्या हालत हो गई थी। हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे। उस समय की तुलना में अब स्थिति बेहतर है। हम घाटी में स्थायी शांति के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं और देर-सबेर उसके नतीजे सामने आएंगे।
पहले उग्रवाद था। लेकिन अब आम लोगों के हाथ में सुरक्षा बलों के खिलाफ पत्थर ज्यादा दिख रहा है।
जवाब-मैं आपकी चिंता को खारिज नहीं कर रहा हूं। लेकिन इसे रोकने के लिए कई प्रयास किये गए और उनका असर भी दिखने लगा है। खासकर रमजान के महीने में आतंकियों के खिलाफ आपरेशन रोकने का फैसला बताता है कि सरकार संवेदनशील है। पहली बार पत्थरबाजी में पकड़े गए युवाओं को भी माफ कर दिया गया था, यह भी सरकार की संवेदनशीलता दर्शाता है। हम दिल भी जीत रहे हैं और भरोसा रखिए कि हम लड़ाई भी जीतेंगे।
संघवाद को मजबूत करने की बात होती है। लेकिन क्या आपको लगता है कि कुछ ऐसे मामले हैं, खास तौर से कानून-व्यवस्था जैसे मामले केंद्र के अधीन होने चाहिए ताकि मजबूती से काम किया जा सके?
जवाब-नही, मैं ऐसा नहीं मानता हूं। देश में जिस तरह के संघीय ढ़ाचें की व्यवस्था है वह बहुत ही उम्दा व्यवस्था है। भारत जैसे विविधता पूर्ण देश में जहां बोलचाल, सोच हर एक मामले में भिन्नता है। वहां सहयोगात्मक संघीय ढांचे की बहुत जरुरत है। इतना जरुर है कि इस संघीय व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने के लिए केंद्र और राच्यों के बीच आपसी सहयोग भी बढऩा चाहिए।
चार साल पहले जब चुनाव-प्रचार शुरू हुआ था, तो अच्छे दिन की बात हुई थी। अब अगर आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था की बात करें, तो आपके लिए ऐसा कौन सा मुद्दा रहा, जिसे लेकर बोल सकते हैं कि जनता के लिए अच्छे दिन आ गए?
जवाब-अगर सम्पूर्ण परिदृश्य की बात करें, तो कोई नकार नहीं सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री ने इन चार वषरें में अथक परिश्रम किया है। आज सभी इसे महसूस कर रहे हैं। भले ही सभी न महसूस कर रहे हो। लेकिन समाज के वंचित और शोषित वर्ग के लोगों को इसका लाभ मिला है। अब जैसे प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के अंतर्गत ही चार करोड़ परिवारों तक मुफ्त एलपीजी गैस कनेक्शन पहुंचाया गया, ये कोई सामान्य बात नहीं है। जन-धन योजना के तहत करोड़ों गरीबों के लिए बैंक अकाउंट की व्यवस्था करके वित्तीय समावेशी योजनाएं चालू करना, खेतीबाड़ी के लिए लोन की व्यवस्था करना आसाम काम नहीं था। यही नहीं, गरीबों के लिए पांच लाख तक का चिकित्सीय सुरक्षा की व्यवस्था करना काफी बड़ा काम है। यह विश्र्व का सबसे बड़ा हेल्थ कवर है। देश का गरीब आदमी कभी भी निजी अस्तपाल में अच्छे इलाज की उम्मीद नहीं कर सकता था। लेकिन अब संभव होने जा रहा है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। आर्थिक मोर्चे पर देश मजबूत हुआ है। आर्थिक दृष्टि से देश मजबूत बना है। कुछ रिपोर्ट में कहा गया कि 2018-19 में विश्र्व की टॉप फाइव अर्थव्यवस्था में भारत शामिल हो जाएगा।
सवासुरक्षा के लिहाज से.?
जवाब-पिछले चार साल में आपने कितनी आतंकी घटनाओं की बात सुनी? आपको याद नहीं कि पिछली सरकार के कार्यकाल में दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बंगलोर .कहां कहां घटनाएं नहीं हुई थीं। कश्मीर जैसे कुछ संवेदनशील इलाकों को छोड़ दीजिए तो आपने पिछले चार साल में क्या राहत नहीं महसूस किया। यह सरकार की दृढ़ता और जनसुरक्षा के प्रति संकल्प को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री ने ढाई साल पहले स्मार्ट पुलिसिंग की बात की थी। वह परवान नहीं चढ़ पाया?
जवाब- उसमें काफी प्रगति हुई है। मैं दावा तो नहीं कर सकता। लेकिन अधिकांश राज्यों में इसे लागू किया जा रहा है। स्मार्ट पुलिसिंग के तहत पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। यह काम शुरू हो चुका है।
गृह मंत्रालय की ओर से सीसीटीएनएस योजना शुरु की गई थी, जिसके अंतर्गत ऑनलाइन एफआइआर दर्ज करने की व्यवस्था शुरु की जानी थी, साथ ही केस की जांच कहां तक पहुंची, उसे ऑनलाइन देखने की बात कही जा रही थी। अभी तक आम लोग उसे प्रयोग करने की स्थिति में नहीं है?
जवाब -इसके लिए आम लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है। सीसीटीएनएस शुरू हो चुका है। आपको जानकर खुशी होगी कि दिल्ली, मुंबई में काफी लोग ऑनलाइन एफआईआर दर्ज कराने लगे हैं। यह सच है कि प्रोजेक्ट काफी समय तक रुका पड़ा था। लेकिन हमने उसकी सारी रुकावटें दूर कर चालू कर दिया है। इसके अगले चरण पर भी काम शुरू हो चुका है।
राज्यपाल को लेकर हमेशा से सवाल उठता है। कहा जा रहा है कि राज्यपाल राजनीतिक संस्था के रुप में कार्य करने लगे हैं?
- देखिए, अगर आपका इशारा हाल की कर्नाटक की घटना की तरफ है तो तो राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुला लिया। तो इसमें नई बात क्या है। ये परंपरा तो पहले भी रही है। लेकिन जो लोग सवाल उठा रहे हैं क्या उन्हें याद दिलाने की जरूरत है कि पिछली सरकारों ने किस तरह कार्यकाल खत्म होने से पहले कई राज्यपालों को बदल दिया था। हमारे कार्यकाल में पिछली सरकार के नियुक्त कई राज्यपालों ने कार्यकाल पूरा किया।
लेकिन सरकार बनाने के दावेदार ने बहुमत साबित करने के लिए सात दिन का वक्त मांगे और राज्यपाल 15 दिन का वक्त दे दें, तो सवाल उठता है?
- देखिए, सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्नाटक के मामले में राज्यपाल के फैसले पर कोई सवाल नहीं उठाया। वो जब कोर्ट ने देखा कि बहुमत साबित करने के लिए ज्यादा समय दिये जाने से लोगों में तरह-तरह की शंकाएं पैदा हो रही है, तो अदालत ने बहुमत परीक्षण का वक्त कम कर दिया। लेकिन राज्यपाल की संस्था पर कोई टिप्पणी की हो, ऐसा नहीं है।
असम के सिटिजन रजिस्टर को लेकर काफी विरोध हो रहा है। ऐसा आरोप लग रहा है कि कुछ खास धर्म के लोगों को राष्ट्रीयता देने का प्रयास किया जा है, बाकी धर्म के लोगों को जगह नहीं दी जा रही है?
- यह व्यवस्था पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए शुरु की गई थी, जिसे लेकर असम में भी कुछ विरोध है। लेकिन यह किसी धर्म विशेष के लिए नहीं है, जो भी वहां अल्पसंख्यक है, हिंदू, ईसाई, पारसी सभी के लिए यह व्यवस्था है। हां कुछ विरोध जरुर है। लेकिन देखेंगे, बातचीत के आधार पर इसका समाधान निकालेंगे।
नगालैंड पीस एग्रीमेंट को लेकर अब तक असमंजस बना हुआ है?
- इस मामले में काफी प्रगित हो चुकी है। इस मामले को आगे बातचीत करके हल कर लिया जाएगा। बातचीत लगातार आगे बढ़ रही है।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों के गठजोड़ की कवायद शुरु हो गई है। लगता नहीं है कि 2019 भाजपा के लिए मुश्किल रहने वाला है?
- नहीं ऐसा नहीं है, इस देश के लोगों में मोदी जी की स्वीकार्यता बनी हुई है। चार साल बीतने के बावजूद देश की जनता में पीएम मोदी के प्रति विश्र्वास और भरोसा कायम है। आपने सर्वे देखा होगा, जिसमें लोग अगले प्रधानमंत्री के रुप में पीएम मोदी को वोट कर रहे हैं।
उपचुनाव के नतीजे से भी आपका विश्र्वास नहीं डगमगाया है?
- एक दो सीटों के उपचुनाव को आम चुनाव से जो़ड़ना गलत है। कुछ स्थानीय कारण होते हैं, कुछ राजनीतिक समीकरण होता है। यह ध्यान रखिए कि उपचुनाव प्रधानमंत्री तय करने के लिए नहीं होता है। जनता के सामने जब बड़ा सवाल खड़ा होता है कि नेतृत्व किसे दिया जाए, चेहरा कौन है, कौन है जो देश का सिर खड़ा रखते हुएआगे बढ़ सकता है तो फैसला उसी अनुरूप होता है। ठीक है कि कुछ उपचुनाव में भाजपा नहीं जीत पाई, हम उस पर भी गौर करेंगे। लेकिन हमारा विश्र्वास और दृढ़ हुआ है।
लेकिन पिछली बार भाजपा को सिर्फ 31 फीसद वोट मिले थे। विपक्षी एकजुटता को क्या आसानी से नकारा जा सकता है?
- मुझे विश्वास है इस बार भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ेगा। कुछ लोगों को आशंका हो सकती है। वक्त आने दीजिए आपको जवाब मिल जाएगा।
पुंछी कमीशन का प्रस्ताव पर इंटर स्टेट काउंसिल की बैठक हुई थी। केंद्र और राच्यों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए कोई ठोस पहल हुई?
- देखिये, सरकारिया कमीशन की रिपोर्ट थी, उस रिपोर्ट पर विचार करने के पुंछी कमीशन बनाया गया था। पुंछी कमीशन ने जो प्रस्ताव दिया था, वो पिछले सात-आठ सालों से यूं ही पड़ा था। इस पर कोई विचार नहीं हुआ। मैंने अंतरराज्यीय परिषद की दो-तीन बैठके बुलाई, जिनमें सभी प्रस्तावो पर विचार किया गया। अगली बैठक इंटर स्टेट काउंलिस की होगी, उसमें मुहर लग जाएगी। इसके बाद सरकारिया आयोग का काम पूरा हो जाएगा।
क्या आपको लगता है कि सरकारिया आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद केंद्र और राच्यों के बीच टकराव और राच्यपाल की भूमिका पर को लेकर विवाद खत्म हो जाएगा?
- पिछले चार सालों में हमने देखा है कि केंद्र और राच्यों के बीच कोई टकराव नहीं हुआ है। किसी राच्य के साथ किसी मुद्दे को लेकर मतभेद हो सकता है। हमेशा कमोबेश ऐसी ही स्थिति रही है। लेकिन केंद्र और राच्य के बीच टकराव नहीं होता।
पुंछी कमीशन में केंद्र-राच्य संबंधों को लेकर क्या प्रस्ताव थे?
- उनके कई प्रस्ताव थे। राच्यों की क्या भूमिका होनी चाहिए। राच्यों में बुनियादी ढ़ाचे का विकास कैसा होना चाहिए। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप किस तरह हो। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के कायरें में राज्यों का हिस्सा कितना होना चाहिए। आदि-आदि।
सरकार पर एक बड़ा आरोप लगता है कि पिछले वषरें में सामाजिक समरसता का ताना-बाना बिगड़ा है?
- यह बिल्कुल आधारहीन आरोप है। पिछले चार वषरें मे कोई दंगा नहीं हुआ है। वहीं, पिछली सरकारो में देखिए। खुद को सेक्युलर कहने वाले दलों के कार्यकाल में बड़े-बड़े दंगे हुए हैं। लेकिन, भाजपा सरकार में नहीं हुए। इसकी वजह यह है कि भाजपा ने कभी भी जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर राजनीति नहीं की है।
लेकिन गौरक्षा और गौमांस खाने के नाम पर किसी को पीट-पीटकर मार देना। इस तरह की घटनाएं विचलित तो करती हैं?
- हां, यह सही है। लेकिन यह घटना उस वक्त हुई थी, जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। प्रधानमंत्री इस मामले में सख्त टिप्पणी कर चुके है। इसके अलावा मेरी ओर से मंत्रालय स्तर पर एडवाइजरी जारी करके ऐसी घटनाओं को रोकने की पहल की गई है। मैं मानता हूं कि राज्यों को सामाजिक समरसता कायम रखने और कानून व्यवस्था का राज स्थापित करने में सख्ती दिखानी चाहिए।
सामाजिक समरसता को लेकर गृह मंत्रालय की ओर से भी कोई कार्यक्रम शुरू किया गया है?
- पब्लिक हारमॉनी फाउंडेशन की पहल पर मंत्रालय की ओर एक कार्यक्रम किया गया, जिसमें कई दिग्गज लोग शामिल हुए। इसमें मुस्लिम, ईसाई और सिख समेत कई धमरें के बौद्धिक लोगों ने हिस्सा लिया। सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी धर्म के मानने वालों का सहयोग लिया जाएगा।

