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निकले थे आतंकवादी बनने, Pok में अल्ताफ मीर बनें YouTube सिंगर

श्रीनगर। अल्ताफ मीर ने 28 साल पहले 1990 में आतंकी बनने के लिए अपना घर छोड़ दिया था। वह कई युवाओं के साथ पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर चला गया था। अल्ताफ का घर से कोई संपर्क नहीं रहा। इस दौरान घर वालों को लगा शायद उसकी मौत हो गई है।

मगर, अचानक अल्ताफ का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वह एक कश्मीरी गाना गाते हुए दिखे। इसके साथ ही मीर का परिवार उनके जिंदा होने की खुशी मनाने लगा। दरअसल, कोक स्टूडियो पाकिस्तान ने हाल ही में अपने यूट्यूब चैनल पर एक कश्मीरी गाना ‘हा गुलो’ जारी किया है।

बेहद कम समय में संगीत प्रेमियों के बीच ये गाना खासा मशहूर हो गया। सिर्फ चार ही दिन में ही इस गाने को 1,50,000 से ज्यादा लोग देख चुके हैं। बता दें कि हा गुलो प्रसिद्ध कश्मीरी कवि, स्वर्गीय गुलाम अहमद मेहजूर के पुराने क्लासिक्स में से एक है।

पाकिस्‍तान के कब्‍जे वाले कश्‍मीर (पीओके) में बनाए गए इस गाने को 12 जुलाई को यू-ट्यूब पर रिलीज किया गया। महज 4 दिनों के भीतर इसे तीन लाख से ज्‍यादा बार देखा जा चुका है। गाने के बोल हैं- हा गुलो तुही मा सा वुचवुन यार मुएं, बुलबुलू तुही चांदतूं दिलदार मुएं।

मीर के भाई जावेद अहमद ने कहा कि वह कमाल की नक्‍काशी करता था। बचपनप से ही उसका संगीत की तरफ झुकाव रहा। खुशी है कि वह आंतकवाद की तरफ नहीं गया। हिट हो रहे इस गाने को कश्मीर के अनंतनाग के मोहम्मद अल्ताफ मीर ने गाया है।

ऐसे बदली जिंदगी

पाकिस्‍तान के लिए रवाना होने के 4 साल बाद मीर 1994 में कश्‍मीर लौट आए, मगर आतंक के रास्‍ते पर नहीं गए। घाटी में आतंकवाद का परिदृश्‍य बदला और विशेषकर अनंतनाग में इखवान (आतंक को काउंटर करने के लिए बनी फोर्स) का प्रभाव बढ़ा। इखवान के डर से मीर 1995 में फिर बॉर्डर पार कर गए, इस बार वह मुजफ्फराबाद में स्‍थायी रूप से बस गए।

मुजफ्फराबाद में मीर ने नक्‍काशी में ट्रेनिंग देने वाले एक एनजीओ के लिए काम शुरू किया, फिर कसामीर नाम से एक बैंड शुरू किया। उन्‍हें अपना पहला बड़ा ब्रेक पिछले साल के अंत में मिला जब कोक स्‍टूड‍ियो की एक टीम पाकिस्‍तान में नई प्रतिभा खोजने निकली।

इस शो के लिए मीर और उनके बैंड- गुलाम मोहम्‍मद डार (सारंगी), सैफ-उद-दीन शाह (तुम्‍बाखनईर, ड्रम जैसा दिखने वाला एक मशहूर कश्‍मीरी वाद्ययंत्र), मंजूर अहमद खान (नाउत, एक कश्‍मीरी वाद्ययंत्र) का चयन किया गया। यह सभी मूल रूप से कश्‍मीर के हैं।

मीर के परिवार के लिए, उसका अचानक चर्चा में आना घाटी में लौटने जैसा ही है। जावेद ने कहा कि हमने बहुत कोशिश की वह कश्‍मीर लौट आए, लेकिन यह संभव नहीं था। अब हमने उसे मशहूर होते देख लिया है, हम बहुत खुश हैं जैसे वह घर लौट आया हो।

पाकिस्तानी रेडियो से भी जुड़े रहे

मीर कई वर्षों तक रेडियो पाकिस्तान से भी जुड़ा रहा। अल्ताफ मीर का गाना लोकप्रिय होने से परिजनों को भी पता चला कि वो जिंदा हैं। ऐसे में परिजन उसे घर वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कई माध्यमों से मीर से गुहार लगाई है कि वो घर वापस लौट आएं। मीर की मां जना बेगम कहती हैं कि उसके जिंदा होने से हमें बेहद खुशी है।

 

उन्होंने कहा कि 28 साल पहले खबर आई थी कि वह आतंकी बन गया। मगर, अब इस बात का संतोष है कि वो अच्छा काम कर रहा है। ऐसा कैसे हुआ यह नहीं पता, लेकिन जैसे भी हुआ उसके लिए अल्लाह का शुक्रिया। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि बेटा जल्द ही घर लौट आएगा।

सूफियाना महफिलों में गाना शुरू किया

मोहम्मद अल्ताफ मीर की ओर से हाल ही में मुज्जफराबाद में दिए गए एक वीडियो इंटरव्यू में बताया कि कई दस्तों के साथ आतंकी बनने के लिए बॉर्डर पार किया था। हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने के कुछ दिन बाद वह घर लौट आए थे। इसके बाद वो दिन में बस कंडक्टरी करते थे और शाम को कपड़ों पर चेन की सिलाई किया करते थे। उन्होंने सूफियाना महफिलों में गाना शुरू कर दिया।

वह महफिलों में ढफली भी बजाते थे। उन्होंने पीर राशिम से संगीत सीखा। एक दोस्त की शादी में उनके गाने को रेडियो मुजफ्फराबाद में काम करने वाले एक व्यक्ति ने सुना। उसने इन्हें रेडियो के डायरेक्टर से मिलवाया और वॉयस टेस्ट के बाद उन्होंने इन्हें काम दे दिया। इस तरह मीर के संगीत की शुरुआत हुई। उन्होंने रेडियो पर हर सप्ताह पांच शो करना शुरू कर दिया। अल्ताफ मीर बताते हैं कोक स्टूडियो नए टैलेंट की तलाश कर रहा था तभी एक महिला ने उनका नाम सुझाया। इस साल अप्रैल में कोक स्टूडियो के प्रोड्यूसरों ने अल्ताफ से मुलाकात की और उन्हें काम दिया।

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