उज्जैन। 14 साल की बेटी के साथ दुष्कर्म के केस में गुरुवार को कोर्ट ने सौतेले पिता को मरते दम तक जेल में रहने की सजा सुनाई है। सुनवाई के दौरान पीड़िता ने कोर्ट में सौतेले पिता के खिलाफ बयान नहीं दिए और समझौता कोर्ट में पेश कर दिया था।

इसके बाद भी कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपित को मरते दम तक जेल में रहने की सजा सुनाई है। घटना के 6 माह के भीतर ही कोर्ट ने फैसला सुना दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की है कि दोषी के प्रति नरमी बरतना जनसमूह की आस्था भंग करना है।

विशेष लोक अभियोजक राजकुमार नेमा ने बताया कि नानाखेड़ा स्थित मॉल में रेस्टोरेंट चलाने वाले व्यक्ति ने 19 फरवरी की रात को 14 साल की सौतेली बेटी के साथ दुष्कर्म किया था। पीड़िता की मां एक कार्यक्रम में शामिल होने गई थी। घर पर सो रहे पीड़िता के दो छोटे भाई शोर मचाने पर उठ गए थे। सौतेला पिता सभी को धमकाकर गया था कि वे किसी को कुछ बताएंगे तो जान से मार देगा।

पीड़िता ने अदालत में नहीं दिए बयान

न्यायालय में पीड़िता ने सौतेले पिता के खिलाफ बयान नहीं दिए। यहां तक कि उसने उसे फायदा पहुंचाने के लिए कपड़ों के रंग भी गलत बताए थे। इसके अलावा उससे समझौता भी कोर्ट में पेश कर दिया, मगर डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव होने के कारण कोर्ट ने सौतेले पिता को दोषी माना गया।

पीड़ित व गवाह बदल सकते हैं, सबूत नहीं

पीड़िता का डीएनए करवाने वाली डॉ. प्रीति गायकवाड़ का कहना है कि मेडिकल के दौरान पीड़िता को मासिक धर्म आ गया था। इसके बाद भी उसका डीएनए करवाया गया जो कि उसके सौतेले पिता से मिल गया। आई विटनेस व पीड़िता के बयान बदलने के बाद भी उनके द्वारा एकत्र किए गए भौतिक साक्ष्य व डीएनए रिपोर्ट के आधार पर सजा सुनाई गई।

कोर्ट ने की टिप्पणी है कि आरोपी द्वारा अपनी सौतेली पुत्री के साथ दुष्कर्म किया जाना प्रमाणित हुआ है। भारतीय न्याय व्यवस्था में जनसमूह की आस्था है। न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध व्यक्ति को दंड देने में नरमी बरतना जनसमूह की आस्था भंग किए जाने के समान है।

अभियोजन द्वारा अपना प्रकरण अभियुक्त के विरुद्ध प्रमाणित कर दिए जाने के बाद न्यायालय का यह दायित्व है कि वह दोषसिद्ध व्यक्ति को उचित दंड से दंडित करे। न्यायालय द्वारा यह लेख किया है कि आरोपी के प्रति उचित उदारता दर्शाई जाना न्याय की विफलता के समान है। केस का अनुसंधान एसआई सलीम खान ने किया। उप संचालक अभियोजन डॉ. साकेत व्यास व एडीपीओ मुकेश कुन्हारे ने विधिक मार्गदर्शन दिया।