दिग्विजय सिंह ने 69 सीटों की कमान संभाली पर जीत सके सिर्फ 7 सीट

2018 में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ‘पंगत में संगत’ कार्यक्रम को कांग्रेस की जीत में अहम माना गया था। इसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं से सीधे बात की थी और उसका असर भी दिखा था। इस बार भी उन्होंने 69 सीटों की कमान संभाली। 6 माह के भीतर सघन दौरा भी किया। कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करके चुनाव की तैयारी की।
आपसी मतभेद भुलाकर उनसे पार्टी के लिए काम में जुटने का संकल्प दिलाया पर यह सफल नहीं हुआ। पार्टी इन चिह्नित सीटों में से केवल 7 (दतिया, बालाघाट, ग्वालियर ग्रामीण, बीना, सेमरिया, टिमरनी और मंदसौर) सीटें ही जीत पाई। अन्य ऐसी सीटें जहां पार्टी थोड़ी मेहनत से जीत सकती थी, उनकी ओर ध्यान ही नहीं दिया गया और यही अति आत्मविश्वास कांग्रेस को भारी पड़ गया।
भाजपा की तरह कांग्रेस ने भी कठिन मानी जाने वाली सीटों को चिह्नित किया। इसमें वे सीटें शामिल की गईं जिनमें लगातार तीन चुनाव से कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ रहा था। इन्हें जिताने की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह ने ली। पूर्व सांसद रामेश्वर नीखरा के साथ उन्होंने सभी सीटों पर पहुंचकर बूथ, सेक्टर और मंडलम की बैठक की। नाराज कार्यकर्ताओं से अलग से संपर्क किया।
कार्ययोजना यह थी कि इन सीटों पर भाजपा की घेराबंदी की जाए पर ऐसा नहीं हुआ। न तो पार्टी की ओर से इन सीटों के प्रत्याशी पहले घोषित हो सके और न ही इन पर भाजपा प्रत्याशियों को घेर सके। यहां कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा के मुकाबले में टिक तक नहीं सके।
दिग्गज हारे
दरअसल, भाजपा ने इन सीटों पर तो कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की घेराबंदी उन्हीं के क्षेत्र में करने की कार्ययोजना पर काम किया। इसका परिणाम भी सामने है। कांग्रेस के डा.गोविंद सिंह, हुकुम सिंह कराड़ा, जीतू पटवारी, तरुण भनोत, कमलेश्वर पटेल, सज्जन सिंह वर्मा सहित अन्य कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए। ये सभी नेता पहले दिन से ही यह मानकर चल रहे थे कि अपना चुनाव आसानी से जीत जाएंगे। यही अति आत्मविश्वास भारी पड़ गया।








