कटनी जीआरपी की अमानवीय हद, पंचनामा के लिए अस्पताल से स्ट्रेचर पर घसीटते हुए स्टेशन मंगवाई लाश
कटनी। सरकारी नुमाइंदे जब कभी कोई मानवीय कार्य करते है तो निःसन्देह उनकी प्रशंसा होती है लेकिन जब इन्ही सरकार के नुमाइंदों का अमानवीय चेहरा सामने आता है तो सारी अच्छाई न चाह कर भी व्यक्ति भूलने पर मजबूर हो जाता है।
पोस्टमार्टम के लिए स्ट्रेचर पर ले जाते शव
आज अमानवीय चेहरे का ऐसा ही एक उदाहरण कटनी जीआरपी मतलब रेल पुलिस का देखने को मिला।
अक्सर किसी दुर्घटना में मृत व्यक्ति का शव कटनी के रेल स्टेशन से जिला अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए स्ट्रेचर पर ले जाते हुए देखा जाता है क्योंकि इतने बड़े जिले में आज भी रेलवे या रेल पुलिस के पास कोई ऐसा शव वाहन नहीं है जिससे शव को जिला अस्पताल लाया जा सके, लेकिन आज नजारा विपरीत था।
नजारा दुःखदायी
अस्पताल से एक शव को स्ट्रेचर पर घसीटते हुए दो युवक स्टेशन की तरफ ले जा रहे थे। यह नजारा देख यशभारत के संवाददाता से रहा नहीं गया तो उसने इस अजीबोगरीब दृश्य के बारे में उन युवको से जानकारी ली।
सुनकर आप भी रह जाएंगे सन्न
इस जानकारी में जो बात सामने आई उसे सुनकर आपका भी दिल भर आएगा। दरअसल एक युवक अपने जिगरी दोस्त का शव एक अन्य युवक की मदद से जिला चिकित्सालय से घसीट कर कटनी मुख्य स्टेशन ले जा रहा था। उसने जो कहानी बताई उसके अनुसार दो युवक किसी के कहने पर आंध्रप्रदेश रोजगार के लिए गए थे।
यहां उन्हें रोजगार के बदले धोखा मिला थक हार दोनों वापस अपने गांव जाने के लिए निकले लेकिन रास्ते मे उनके साथ जो कुछ हुआ वह ईश्वर किसी के साथ न करे।
सिंगरौली के आदिवासी युवको के साथ हादसा
सिंगरौली से आदिवासी युवक राममिलन बैगा 31 वर्ष अपने दोस्त रामनरेश बैगा के साथ आंध्रप्रदेश के मेलूर गए थे। यहां जिस व्यक्ति ने रोजगार के लिए कहा था वह गायब हो गया। काफी भटकने के बाद भी जब इन दोनों को रोजगार नहीं मिला तो कल इन दोनों ने वापस सिंगरौली जाने के लिए ट्रेन पकड़ी।
स्टेशन पर ही हो गई मौत
मेलूर से ही राममिलन की तबियत कुछ खराब थी। कटनी आते आते उसकी तबियत औऱ बिगड़ गई। इधर कटनी स्टेशन पर ये दोनों सिंगरौली ट्रेन पकड़ने उतरे। इसी बीच राममिलन बेहोश हो गया। स्टेशन पर जीआरपी के एक आरक्षक ने रामनरेश को जिला अस्पताल जाने के लिए कहा। रामनरेश जैसे तैसे अपने मित्र को लेकर जिला अस्पताल पहुंचा लेकिन यहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
शुरू हुआ सरकारी औपचारिकता का खेल
अब शुरू हुआ सरकारी औपचारिक खेल। पोस्टमार्टम के लिए म्रतक का पंचनामा आदि किया जाना था। सो अस्पताल चौकी ने रामनरेश को जीआरपी भेज दिया। यहां बैठे अधिकारी से औपचारिकता पूरी करने के लिए रामनरेश गिड़गिड़ाते हुए अस्पताल चलने का आग्रह करता लेकिन उस अधिकारी ने एक न सुनी और फरमान सुना दिया कि लाश को स्टेशन वापस लाना पड़ेगी।
दोस्त निकल पड़ा लाश लेकर
इधर उधर गिड़गिड़ाने के बाद भी जब बेचारे रामनरेश को कोई भी मदद नहीं मिली तो उसके पास एक ही चारा था स्ट्रेचर पर शव को लाद कर वापस स्टेशन लाया जाए तो बेचारे ने यही किया। और निकल पड़ा अपने दोस्त को स्ट्रेचर पर लेकर वापस स्टेशन।रास्ते मे यशभारत के संवाददाता ने जब जानकारी ली और जीआरपी को इस अमानवीय घटना के लिए पूछा तो वहां से गोलमोल जवाब दिया जाने लगा। बहरहाल तब तक शव स्टेशन पहुंच चुका था। औपचारिकता निभा कर उसे फिर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में न तो अस्पताल चौकी पुलिस ने अस्पताल में ही औपचारिकता या शव को वापस किसी शव वाहन से पहुंचाने की व्यवस्था की न ही जीआरपी ने औपचारिकता के लिए अस्पताल पहुंचने की जहमत उठाई। कुलमिलाकर इस संवेदनहीनता से एक युवक अपने दोस्त का शव स्ट्रेचर पर लेकर सड़कों में घूमता रहा।
चांद पर जाने वाले देश की हकीकत
यह सब उस देश मे है जहां हम चांद पर कदम रखने में खुश हो जाते हैं। हवाई अड्डा बनाने की मांग करते हैं। रेलवे स्टेशन में यरकस्लेटर पर चल कर खुश होते हैं या फिर 4 जी मोबाइल से वीडियो कॉलिंग कर वीडियो मीटिंग कर अपने आप को बेहद उन्नत समझने की भूल करते हैं।
दरअसल हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता आज भी उन्नत औऱ विकसित नहीं हो सकी। बदन पर खाकी का रुतबा आज भी जनता के प्रति ऐसे अमानवीय द्रश्य से हमारे सिस्टम औऱ सरकार का सिर शर्म से नीचा कर देते हैं।

