कटनी की डॉक्टरी कर रही इस बेटी ने किडनी देकर मां की जान बचाई
कटनी। कटनी की होनहार बेटी जाे कि विदेश में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है, उसने अपनी मां को किडनी देकर नया जीवन दिया है। उनकी मां की करीब दो वर्ष पहले अचानक किडनी खराब हो गई थी। जब उसे पता चला कि उसकी मां को किडनी की आवश्यकता है तो वह मेडिकल कॉलेज से अवकाश लेकर तुंरत स्वदेश लौट आई।
सफलापूर्वक किडनी प्रत्यारोपण के बाद वह तुरंत वापस लौट गई। जिससे की पढ़ाई में किसी प्रकार की दिक्कत न आए। अब मां-बेटी दोनों स्वस्थ हैं। यह जानकारी नीलम बाटा रोड स्थित फोर्टिस अस्पताल के वरिष्ठ किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. रितेश मोंग ने दी।
उन्होंने बताया कि 42 वर्षीय रेखा को मार्च के अंतिम सप्ताह में प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल लाया गया था। जांच के बाद पाया गया कि गुर्दे का रोग बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। डायलिसिस के बावजूद भी उन्हें दिक्कतें आ रही थी। हालत अत्यधिक गंभीर होने पर उन्हें प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल लाया गया था।
जहां डॉक्टरों की टीम ने तुरंत किडनी प्रत्यारोपण की सलाह दी। रोगी के परिवार में ऐसा कोई सदस्य नहीं था जो रेखा को किडनी दान कर सके। इसकी जानकारी मिलते ही रोगी रेखा की 24 वर्षीय पुत्री हेमलता सिंह फौरन विदेश से मां को अपनी इच्छा से किडनी देने के लिए भारत पहुंच गईं। चूंकि वह खुद मेडिकल छात्रा हैं और भली-भांति इससे परिचित होने के बावजूद कि गुर्दे (किडनी) प्रत्यारोपण के बाद आगे उनके जीवन में उनके लिए किस तरह की परेशानी आ सकती है, इसकी परवाह किए बगैर मां को किडनी देने का साहसिक निर्णय लिया इसके बाद मां और बेटी की कई प्रकार की जांच हुई। इसमें सभी कुछ ठीक पाया गया।
इसके बाद अप्रैल के प्रथम सप्ताह में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रितेश मोंग रेखा का प्रत्यारोपण किया। उन्होंने बताया कि तीन दिनों के बाद ही मां-बेटी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अब दोनों सामान्य जीवन जी रही हैं। इस मौके पर अस्पताल के फैसिलिटी डायरेक्टर हरदीप सिंह ने बताया कि यह एक मां- बेटी की प्रेरकदायक कहानी है। ऐसे साहसिक निर्णय मां, बच्चे ही एक दूसरे के प्रति ले सकते हैं।
फौज में जाना चाहता है भाई
हेमलता का भाई फौज में जाना चाहता है, इसलिए उसने किडनी नहीं दी। उसका कहना है कि भविष्य में उसे दिक्कत हो सकती थी। इसलिए उसकी बहन ने किडनी देने का निर्णय लिया। सबसे पहले मम्मी की मां (नानी) ने अपनी किडनी देने का निर्णय लिया था, लेकिन कुछ पारिवारिक कारणों से इस पर सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद बहन हेमलता ने किडनी दी।
किडनी ट्रासप्लांट कराने वालों की संख्या
वर्ष 2010 : 10
वर्ष 2011 : 13
वर्ष 2012 : 24
वर्ष 2013 : 19
वर्ष 2014: 17
वर्ष 2015 : 09
वर्ष 2016 : 34
वर्ष 2017 : 36
वर्ष 2018 : 19
(अबतक)
(स्रोत स्वास्थ्य विभाग)

