Monday, April 6, 2026
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उपचुनाव में इतनी जद्दोजेहद और बस एक साल रहेंगे सांसद!

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उपचुनाव कराने में चुनाव आयोग तो मोटा धन खर्च करता ही है. उम्मीदवार भी रुपयों की नदी बहा देते हैं. हर सीट पर उपचुनाव कराने में करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं
कैराना समेत देश में जिन चार जगहों पर लोकसभा उपचुनाव के नतीजे आ रहे हैं, उनके विजेताओं का कार्यकाल पांच साल नहीं महज एक साल का ही होगा. जैसे ही 16वीं लोकसभा का कार्यकाल तीन जून को खत्म होगा, इनकी सदस्यता की अवधि भी खत्म हो जाएगी.

देशभर में जिन स्थानों पर लोकसभा के उपचुनाव हुए हैं, उसमें कैराना (यूपी), पालघर (महाराष्ट्र), भंडारा गोंदिया (महाराष्ट्र) और नागालैंड शामिल हैं. इसके अलावा 10 विधानसभा सीटों के लिए भी उपचुनाव हुए.

चुनाव आयोग लोकसभा के लिए देश में चार संसदीय क्षेत्रों में हाल में उपचुनाव आयोजित कराए थे. 31 मई को उन सभी के रिजल्ट घोषित हो रहे हैं. इन सभी के विजेताओं को सांसद के तौर पर सालभर ही नसीब होंगे. वो कार्यकाल खत्म होने के बाद बतौर पूर्व सांसद पूरी पेंशन के हकदार जरूर होंगे. हालांकि इसको लेकर जरूर विवाद है कि अगर लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने में अब महज एक साल ही बचे हैं तो इन लोकसभा चुनावों का क्या औचित्य है.

क्या कहता है संविधान
जनप्रतिनिधित्व कानून 151-ए के अनुसार अगर किसी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र में सीट खाली हुई हो तो इसके खाली होने के छह महीने के अंदर चुनाव कराए जाने चाहिए. साथ ही धारा 147, 149, 150 और 151 भी ये कहता है कि किसी भी सूरत में सीट खाली होने पर उसके उपचुनाव कराए जाने चाहिए.

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किन कारणों से कोई सीट खाली हो सकती है
– निर्वाचित प्रतिनिधि की मृत्यु से
– इस्तीफा देने से
– अयोग्य ठहरा दिए जाने से

सदन का कार्यकाल एक साल बचा हो तो क्या उपचुनाव होने चाहिए.
हालांकि इसको लेकर कोई स्पष्टता नहीं है, लेकिन चुनाव आयोग ने अपना एक नियम बना रखा है कि अगर सदन का कार्यकाल सालभर से कम बचा हो तो उपचुनाव नहीं कराए जाने चाहिए. पिछले दिनों पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णामूर्ति ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगर सदन का कार्यकाल खत्म होने में सालभर भी बचा हो तो चुनाव आयोग उपचुनावों से परहेज करता है. बशर्ते सुप्रीम कोर्ट इसके बारे में कोई आदेश नहीं दे दे.

एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी भी यही मानते हैं अगर कार्यकाल एक साल से कम बचा हो तो उपचुनाव नहीं होने चाहिए.

उपचुनाव के विरोध में भी उठी हैं आवाजें
इसे लेकर कई बार आवाजें उठ चुकी हैं कि अगर सदन का कार्यकाल आधे से कम बचा हो तो उपचुनाव कराना संसाधनों और धन की बर्बादी है

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लोकसभा (फाइल फोटो)

भारत में उपचुनाव की क्या प्रक्रिया है
– जब भी किसी सदस्य के निधन या इस्तीफे के कारण लोकसभा या विधानसभा की सीट खाली होती है तो छह महीने के भीतर वहां पर नए सदस्य के लिए चुनाव कराए जाने चाहिए. किसी भी चुनाव के लिए चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया 90 दिनों की होती है. इसमें नोटिफिकेशन से लेकर चुनाव परिणाम घोषित करना शामिल होता है . लेकिन चुनाव आयोग इससे भी पहले भी तैयारी के लिए कम से कम एक महीने लगते हैं. अपने देश में उपचुनाव लगातार चलते रहते हैं और ये सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं.

पिछले चार सालों में कितने उपचुनाव
वर्ष 2014 – 64 जगहों में उपचुनाव हुए, जिसमें लोकसभा और विधानसभा की सीटें शामिल थीं
वर्ष 2015 – 23 सीटों पर उपचुनाव, जिसमें दो लोकसभा सीटें
वर्ष 2016 – 28 सीटों पर उपचुनाव, जिसमें दो लोकसभा सीटें
वर्ष 2017 – 21 सीटों पर उपचुनाव, जिसमें दो संसदीय सीटें
वर्ष 2018 – मार्च में 15 सीटों पर उपचुनाव हुए, जिसमें छह संसदीय सीटें थीं
वर्ष 2018 – मई में 14 सीटों पर उपचुनाव हुए, जिसमें चार संसदीय सीटें हैं
(स्रोत – भारतीय चुनाव आयोग)

क्या अब इस साल और उपचुनाव होंगे 
– नहीं अब ऐसा नहीं लगता. हालांकि कर्नाटक से दो भारतीय जनता पार्टी के दो सांसदों ने इस्तीफा दिया था. उनका इस्तीफा मंजूर होने के बाद लोकसभा की वो दो सीटें भी खाली हो गई हैं लेकिन लगता नहीं कि अब इस साल या अगले साल कोई उपचुनाव होंगे. अब अगले साल सीधे 17वीं लोकसभा के लिए आमचुनाव ही होंगे.

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम

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