इस ई-कॉमर्स कंपनी के कर्मचारियों की मौज, हफ्ते में करेंगे सिर्फ 16 घंटे काम

नेशनल डेस्क।। हफ्ते में पचास से साठ घंटे काम करने के बाद हर शख्स एक दिन की छुट्टी का बड़ी बेसब्री से इंतजार करता है। मगर ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन हफ्ते में तीस घंटे काम का प्लान लागू करने जा रही है।
हफ्ते में तीस घंटे काम का प्लान-
कर्मचारियों की कार्यक्षमता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए अमेजन हफ्ते में तीस घंटे काम के पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत करने जा रहा है। इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत कंपनी कर्मचारियों से हफ्ते में तीस घंटे काम लेगी, इसके एवज में कर्मचारियों की मौजूदा सैलरी में एक चौथाई की कटौती होगी। इसके अलावा बाकी सभी सुविधाएं कर्मचारियों को पहले की तरह मिलती रहेगी।
हफ्ते में 16 घंटे कर्मचारी करेंगे काम-
इसके तहत काम करने वाले कर्मचारियों को सोमवार से गुरुवार तक काम करना होगा और वो भी रोजाना सुबह दस से दोपहर दो बजे तक, यानि केवल चार घंटे। कर्मचारियों को इस कार्यप्रणाली के बाहर भी काम करने की छूट रहेगी। ऐसे में पायलट प्रोजेक्ट में शामिल कर्मचारी बाकी साथियों के साथ हफ्ते में 16 घंटे वक्त बिताएंगे। हालांकि अमेजन ने भी ये साफ नहीं किया है कि काम का ये फॉर्मूला कंपनी में कब से लागू होगा।
काम का ये प्लान टेक कंपनी ट्री हाउस से लिया गया है, जहां हफ्ते में 32 घंटे काम करने का मॉड्यूल लागू है। इस बारे में टेक कंपनी ट्रेक हाउस के सीईओ रायन कारसन का कहना है कि- ‘हमने काम का ये फॉर्मूला लागू करने के दिखाया कि दूसरी कंपनियां भी अपने कर्मचारियों के लिए इस मॉडल को लागू कर सकती हैं। इससे उनकी कार्यक्षमता में इजाफा होगा।’
ऐसे कम काम से कर्मचारियों का बढ़ेगा उत्साह-
पिछले कई सालों से दुनिया भर में हुई रिसर्च से ये बात सामने आई है कि ज्यादा देर तक काम करने की वजह से कर्मचारी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। खासतौर पर उन कर्मचारियों में पीठ दर्द के अलावा बैचेनी की शिकायत बढ़ जाती है, जो हफ्ते में चालीस घंटे डेस्क जॉब करते हैं।
मगर ये तो कर्मचारियों को होने वाली परेशानी का छोटा सा ही हिस्सा है। क्योंकि ज्यादा देर तक काम करने की वजह से कर्मचारियों को लाइफस्टाइल डिसऑर्डर से जुड़ा मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारी घेर लेती है और आगे जाकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी हो जाती है। वहीं ऐसे कर्मचारी धीरे-धीरे शराब के नशे में डूबने के साथ ही डिप्रेशन में चले जाते हैं।
ऐसे में काम के घंटे काम होने से कर्मचारियों को मानसिक तनाव कम होना। इसके कम होने से लाइफस्टाइल डिसऑर्डर से जुड़ी दूसरी बीमारियों के होने की आशंका भी कम हो जाएगी।
अपने नागरिकों की सेहत पर चिंता जताते हुए डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे पहले ही अपने यहां काम के घंटे कम कर चुके हैं। इसका असर भी दिखने लगा है, क्योंकि इन देशों में किए गए सर्वे के बाद ये तथ्य सामने आए कि यहां के लोग पहले के मुकाबले काफी खुश पाए गए।
कंपनियों को इससे ये फायदा होगा-
कर्मचारियों की खराब सेहत और मानसिक रुप से बीमार होने का असर कंपनियों के बिजनेस पर भी पड़ता है। क्योंकि तबीयत खराब होने की वजह से कर्मचारी काम पर ज्यादा बेहतर तरीके से ध्यान नहीं दे पाते हैं और अक्सर छुट्टियां लेते हैं। वहीं कंपनियों पर मेडिकल बिल का भी बोझ बढ़ता है।
ऐसे में काम के घंटे कम होने से कर्मचारियों के पास आराम का पूरा मौका होगा और वो परिवार के साथ ज्यादा वक्त बिता सकेंगे। ऐसे में वो अपने काम पर ज्यादा बेहतर तरीके से फोकस कर पाएंगे और कंपनी के प्रति ज्यादा ईमानदार रहेंगे।
ये तथ्य हवा हवाई नहीं है, क्योंकि स्वीडन जैसे देशों में जहां रोजाना 6 घंटे काम करने का मॉडल लागू है। वहां कर्मचारियों न सिर्फ ज्यादा सेहतमंद हैं, बल्कि कंपनियों का मुनाफा और बिजनेस भी उस अनुपात में बढ़ा है।
ऐसे में जो लोग हफ्ते में चालीस घंटे से ज्यादा बैठने वाला डेस्क जॉब करते हैं, उन्हें बीच-बीच में छुट्टी लेनी चाहिए, वर्ना उनकी सेहत खराब हो जाएगी।







